नागपुर पदवीधर सीट पर कांग्रेस के वंजारी जीते, दूसरी पसंद के वोटों ने पलटा नतीजा
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
विधान परिषद की नागपुर विभाग पदवीधर सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहळे को 3,271 वोटों से हराया।
नागपुर को भाजपा के लिए सिर्फ एक राजनीतिक केंद्र नहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के असर वाला गढ़ माना जाता है। इसी नागपुर विभाग पदवीधर चुनाव क्षेत्र में विधान परिषद के चुनाव में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को हरा दिया। इस नतीजे की अब काफी चर्चा हो रही है।
शुरुआती गिनती में भाजपा को बढ़त मिली थी और पहली पसंद के वोटों में भी उसका आंकड़ा आगे था, इसलिए पार्टी की जीत पक्की मानी जा रही थी। लेकिन दूसरी पसंद के वोटों ने पूरी तस्वीर बदल दी। आखिर में वंजारी 3,271 वोटों से जीते और भाजपा को बड़ा झटका लगा। नतीजे के बाद भाजपा के चुनाव प्रबंधन, उम्मीदवार के चयन और अपने पारंपरिक मतदाताओं से रिश्तों पर सवाल उठने लगे हैं।
गिनती 27 अक्टूबर को सुबह 8 बजे मानकापुर के विभागीय खेल संकुल में शुरू हुई। इसके लिए कुल 84 टेबल लगाए गए थे और प्रक्रिया 41 घंटे से ज्यादा चली। कांग्रेस के अभिजीत वंजारी को पहली और दूसरी पसंद के वोट मिलाकर 67,231 वोट मिले, जबकि भाजपा के सुधाकर कोहले को 63,960 वोट मिले। चुनाव निर्णय अधिकारी और विभागीय आयुक्त विजयलक्ष्मी बिदरी ने वंजारी को जीत का प्रमाणपत्र सौंपा।
पहली पसंद के दो राउंड में कोई भी उम्मीदवार जीत के लिए जरूरी 75,438 वोटों का कोटा पूरा नहीं कर सका। कुल 1,65,906 वोटों में से 15,032 वोट अवैध निकले और 1,50,874 वोट वैध माने गए। चुनाव नियमों के हिसाब से फिर दूसरी पसंद के वोटों की गिनती और उम्मीदवारों को बाहर करने की प्रक्रिया चलाई गई। उसमें भी कोई उम्मीदवार कोटे तक नहीं पहुंचा। आखिर में सबसे ज्यादा 67,231 वोट पाने वाले वंजारी को विजयी घोषित किया गया।
भाजपा की हार के कारणों के तौर पर कई बातें कही जा रही हैं। पहली बात यह कि उम्मीदवार तय करने के दौरान ही नागपुर भाजपा में मतभेद सामने आ गए थे। कहा जा रहा है कि इस नाराजगी से कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना चुनौती बन गया और आगे के प्रचार व मतदान पर इसका असर पड़ा होने की आशंका है।
चर्चा थी कि अनिल सोले ने गिरीश व्यास के साथ मिलकर बगावत का रुख अपनाया था। बाद में यह बगावत शांत हो गई, लेकिन सवाल उठा कि उससे पैदा हुई नाराजगी पूरी तरह दूर हुई या नहीं। कहा जा रहा है कि पार्टी के भीतर असंतोष मिटाने की अधूरी कोशिशों का नुकसान भाजपा को हुआ।
यह भी बताया जा रहा है कि भाजपा के कुछ पारंपरिक मतदाताओं ने वोटिंग को लेकर उदासीनता दिखाई या अवैध वोट डालकर अपनी नाराजगी जताई। यानी सिर्फ पार्टी का पारंपरिक असर काफी नहीं था और मतदाताओं का सक्रिय समर्थन जुटाने में भाजपा पीछे रह गई।
चुनाव प्रबंधन की कमियों की बात भी हो रही है। पहली पसंद के वोटों में भाजपा को कांग्रेस पर 4,291 वोटों की बढ़त मिली थी। लेकिन आपत्ति यह उठाई जा रही है कि पसंदक्रम के हिसाब से होने वाली गिनती पर ठीक से सोचा नहीं गया। यह मान लेना कि पहली पसंद की बढ़त बनी रहेगी, भाजपा को महंगा पड़ा हो सकता है। इसी तरह पदवीधर चुनाव में छोटी पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों के वोट भी निर्णायक हो सकते हैं, और दूसरी व तीसरी पसंद के वोटों की अहमियत समझकर उनसे संपर्क करना जरूरी था। भाजपा की रणनीति में इन वोटों को पर्याप्त जगह नहीं मिली, ऐसा नतीजे के बाद साफ हुआ है।
एक और चर्चा यह थी कि भाजपा ने ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं दिया, इसलिए इस समाज के कुछ मतदाता नाराज थे। बताया जाता है कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दायरे में भी इसे लेकर कानाफूसी चल रही है। इस नाराजगी का वोटिंग पर कितना असर पड़ा, इसके आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
कांग्रेस की तरफ से बताया जाता है कि अभिजीत वंजारी ने बहुत समझदारी से रणनीति बनाई। उन्होंने पार्टी के सभी नेताओं का समर्थन जुटाया और यह भी ध्यान रखा कि दूसरे उम्मीदवारों को मिलने वाले वोटों में भी उन्हें फायदा हो। वे दूसरे उम्मीदवारों के संपर्क में रहे और दूसरी व तीसरी पसंद के वोट पाने की कोशिश की। मतपत्र पर अगली पसंद के हिसाब से वोट ट्रांसफर होते वक्त यह रणनीति निर्णायक रही।
नितेश कराले को 24,249 वोट मिले, जिससे भाजपा और कांग्रेस दोनों के वोटों का गणित बदल गया। पिछले चुनाव के मुकाबले उन्हें इस बार करीब साढ़े तीन गुना वोट मिले हैं। इसका राजनीतिक मतलब यह निकाला जा रहा है कि भाजपा विरोधी नाराजगी का कुछ हिस्सा दूसरे उम्मीदवारों की तरफ गया। हालांकि सिर्फ वोटों की संख्या से हर मतदाता की सोच का पक्का नतीजा नहीं निकाला जा सकता। विश्लेषण में कहा जाता है कि कराले को पहली पसंद देने वाले कुछ मतदाताओं के मतपत्रों पर अगली पसंद का फायदा वंजारी को मिला।
नतीजे के बाद भाजपा प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने हार की विस्तृत समीक्षा की तैयारी शुरू की है, ऐसी जानकारी है। नागपुर और पुणे विभागों के जिलों का लेखा-जोखा लिया जाएगा और जिलाध्यक्षों, विधायकों और मंत्रियों के कामकाज की जांच हो सकती है। बताया जाता है कि सहयोगी दलों ने चुनाव में जो भूमिका निभाई, उसकी भी समीक्षा होगी। रवींद्र चव्हाण के 2 नवंबर को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिलने की जानकारी है, और उस बैठक में हार के कारणों, महायुति के सहयोगी दलों की भूमिका और चुनाव प्रबंधन की कमियों पर रिपोर्ट रखी जा सकती है।
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