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सूखे में चारे के लिए जिला योजना निधि का कम से कम 5 प्रतिशत देने का फैसला

सूखे में चारे के लिए जिला योजना निधि का कम से कम 5 प्रतिशत देने का फैसला तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 टीम

पशुसंवर्धन मंत्री पंकजा मुंडे ने बताया कि राज्य सरकार ने चारा उत्पादन, संवर्धन और वैकल्पिक स्रोतों के लिए कार्य योजना बनाई है। 30 अक्टूबर 2026 को शासन निर्णय जारी हुआ।

मुंबई, 30 अक्टूबर: अल-नीनो के असर से इस साल बारिश कम हुई है और राज्य में सूखे के हालात बन गए हैं। ऐसे में जानवरों के लिए चारा बराबर मिलता रहे, इसके लिए राज्य सरकार ने एक बड़ी कार्य योजना तैयार की है। पशुसंवर्धन मंत्री पंकजा मुंडे ने यह जानकारी दी।

मंत्री मुंडे के मुताबिक जिला वार्षिक योजना के तहत चारा उत्पादन, मौजूद चारे के संवर्धन और वैकल्पिक चारा स्रोत विकसित करने के लिए कम से कम पांच प्रतिशत निधि दी जाएगी। इसके साथ चारा बैंक बनाने, हायड्रोपोनिक्स और अजोला तरीके से चारा उगाने, एक जिले से दूसरे जिले में चारा भेजने और चारा छावनियों का डिजिटल मैनेजमेंट करने जैसे कई उपाय भी लागू किए जाएंगे।

सूखे पर उपाय सुझाने के लिए राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल उपसमिति बनाई गई थी। उपसमिति के फैसले के हिसाब से राजस्व विभाग के अपर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक अध्ययन समूह बना। इस समूह ने चारे की किल्लत से निपटने के लिए कई सिफारिशें दीं। 27 अक्टूबर को हुई उपसमिति की बैठक में ये सिफारिशें मंजूर हुईं और 30 अक्टूबर 2026 को शासन निर्णय जारी कर दिया गया। समूह की सिफारिशों में चारा उत्पादन बढ़ाना, मौजूद चारे का संवर्धन और मूल्यवर्धन, चारा छावनियों का पारदर्शी मैनेजमेंट और वैकल्पिक स्रोत शामिल हैं।

पंकजा मुंडे ने कहा, "सूखे में किसान, पशुपालक और उनके जानवरों को चारे की कमी महसूस न हो, इसके लिए सरकार ने सोच-समझकर उपाय हाथ में लिए हैं। सिर्फ चारा छावनियां शुरू करने तक सीमित न रहकर चारे का उत्पादन बढ़ाने, मौजूद चारे को ठीक से सहेजने और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। सभी संबंधित विभाग तालमेल से काम करके इन उपायों को असरदार तरीके से लागू करें।"

अध्ययन समूह की योजना के अनुसार रबी सीजन में चारे के बीज की कमी न हो, इसलिए महाबीज और दूसरे बीज उत्पादकों से बीज मुहैया कराए जाएंगे। कम पानी में होने वाली और एक से ज्यादा बार काटी जा सकने वाली चारा फसलों को बढ़ावा मिलेगा। कृषि विश्वविद्यालयों, तालुका बीज गुणन केंद्रों और कृषि महामंडल की जमीन पर मक्का, न्यूट्रीफीड, शुगरग्रेज, ज्वार और बाजरा जैसी फसलें लगाई जाएंगी। पशुसंवर्धन विभाग की संस्थाओं के प्रक्षेत्र पर भी चारा लगाया जाएगा। गोचर भूमि, चरागाह, बंजर और पड़ती जमीन पर चारा लगाने के लिए अलग-अलग विभागों की योजनाओं में तालमेल बैठाया जाएगा। जलसंपदा विभाग की मदद से जलाशय की गाद वाली जमीन किसानों और पशुपालकों को चारे के लिए दी जाएगी। वन विभाग की जमीन की घास समय पर काटकर रखी जाएगी और जरूरत पड़ने पर पशुपालकों को दी जाएगी।

जिलेवार चारा बैंक बनाने की सिफारिश की गई है, जिसमें किसान उत्पादक संस्थाओं, कंपनियों और स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद ली जाएगी। चारा कटाई और गठ्ठे बांधने के लिए कृषि और पशुसंवर्धन विभाग की मशीनें दी जाएंगी। सूखे को देखते हुए ढुलाई खर्च छोड़कर सूखे चारे का अधिकतम आधारभूत दाम 12 रुपये प्रति किलो और साइलेज का अधिकतम आठ रुपये प्रति किलो तय किया गया है।

पशुपालकों के लिए "चारा साक्षरता अभियान" चलेगा। इसमें चारे की सही कटाई और भंडारण, साइलेज बनाने, यूरिया और एंजाइम प्रक्रिया तथा धान की पराली के मूल्यवर्धन की ट्रेनिंग और प्रदर्शन होंगे। हायड्रोपोनिक्स, अजोला और बिना कांटे की नागफनी की खेती जैसे तरीकों को भी बढ़ावा मिलेगा। राज्य के पशु चिकित्सा दवाखानों में प्रायोगिक तौर पर हायड्रोपोनिक्स और अजोला से चारा उगाने की भी योजना है।

चारे की किल्लत के दौरान चारा सिर्फ जानवरों के खाने के काम आए, इसके लिए पैकिंग, बायोफ्यूल और बिजली बनाने जैसे कामों में चारे के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाएगी। सूखे में राज्य का चारा पड़ोसी राज्यों में भेजने पर कानूनी रोक लगाने की जिम्मेदारी जिलाधिकारियों को दी गई है। किसी जिले में जानवरों के लिए जरूरी चारा न हो तो पास के जिले से चारा लेने के लिए संभागीय आयुक्त, पशुसंवर्धन विभाग और जिलाधिकारी के बीच तालमेल बैठाया जाएगा।

चारा छावनियों में पारदर्शिता के लिए राज्य स्तर पर ऑनलाइन "चारा छावनी मॉनिटरिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम" बनाई जाएगी। इसमें जानवरों की रजिस्ट्री, रोज की हाजिरी, चारे की आवक और बंटवारा, पानी, पशु चिकित्सा सेवा, खर्च और भुगतान की जानकारी मिलेगी। हर छावनी में बायोमेट्रिक या क्यूआर कोड से हाजिरी, भारत पशुधन प्रणाली में रजिस्ट्री की जांच और 24 घंटे चालू सीसीटीवी जरूरी किए जाएंगे।

चारा छावनियों के नियोजन के लिए जिला स्तर की सूखा प्रबंधन निगरानी और समीक्षा समिति में पालक मंत्री अध्यक्ष के तौर पर शामिल होंगे। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में अलग जिला स्तरीय कार्यकारी समिति बनेगी। स्थानीय हालात, जानवरों की संख्या, चारे की उपलब्धता और पानी की स्थिति देखकर जरूरत के हिसाब से छावनियां शुरू करने का फैसला होगा।

चारा प्रबंधन में चीनी मिलों, दूध उत्पादक सहकारी संस्थाओं, गोशालाओं, स्वयंसेवी संस्थाओं और किसान उत्पादक कंपनियों को भी शामिल किया जाएगा। चीनी मिलों से गन्ने का अगोला, बगास और शीरा लेने की योजना है। चारा उत्पादन के लिए रियायती दर पर बिजली देने की सिफारिश भी की गई है, जिस पर ऊर्जा विभाग कार्रवाई करेगा। चारा छावनियों की सुविधाओं, चारा कटाई मशीनों, साइलेज बनाने, पीने के पानी और सफाई के लिए सीएसआर निधि इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया है।

पशुसंवर्धन विभाग जिलेवार चारे का लेखा-जोखा बनाकर साप्ताहिक रिपोर्ट देगा। छावनियों में जानवरों की सेहत और चारे व पशुखाद्य की क्वालिटी की जांच भी होगी। संबंधित विभागों को सिफारिशों के मुताबिक जरूरी आदेश जारी करने की मंजूरी दी गई है। यह शासन निर्णय राज्य सरकार की वेबसाइट www.maharashtra.gov.in पर उपलब्ध है।

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