रूस पर बयानबाजी रोकें, पेंटागॉन ने बाल्टिक देशों के नेताओं से कहा
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रूस के साथ डिज़ल और तेल का करार होने के बाद अमेरिका ने यूरोपीय नेताओं से मॉस्को के खिलाफ तीखी बातें टालने को कहा है। इससे नाटो में मतभेद के संकेत मिल रहे हैं।
रूस के साथ हाल ही में बड़ा डिज़ल और तेल करार होने के बाद ट्रम्प प्रशासन का रुख बदल गया है। अमेरिका के रक्षा विभाग यानी पेंटागॉन ने यूरोपीय देशों के नेताओं को साफ और सख्त चेतावनी दी है कि वे रूस के खिलाफ आक्रामक बयान या टीका-टिप्पणी फौरन बंद करें। इस रुख की वजह से नाटो (NATO) के देशों के बीच मतभेद बढ़ने के साफ संकेत मिल रहे हैं।
कुछ महीने पहले तक हालात अलग थे। तब ट्रम्प प्रशासन रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत यानी 100 फीसदी शुल्क (Tariffs) लगाने की योजना बना रहा था। फिर अमेरिका ने खुद रूस के साथ तेल करार कर लिया, और उसके बाद रूस को लेकर वॉशिंगटन की नीति पूरी तरह बदल गई। अब अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि यूरोपीय नेताओं के रूस के खिलाफ कुछ बयान पूरे यूरोपीय महाद्वीप की सुरक्षा और शांति के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं। इसी वजह से यूरोपीय देशों पर मॉस्को के खिलाफ अपनी भाषा नरम करने का दबाव बढ़ाया जा रहा है।
पेंटागॉन ने खास तौर पर लिथुआनिया, लाटविया और एस्टोनिया, इन तीन बाल्टिक देशों के नेताओं से रूस के खिलाफ बोलते वक्त संयम रखने को कहा है। यह संदेश एलब्रिज कोल्बी (Elbridge Colby) ने यूरोपीय नेताओं तक पहुंचाया। कोल्बी पेंटागॉन के नीति प्रमुख हैं और यूरोप में अमेरिकी फौज की तैनाती की समीक्षा करने वाली उच्चस्तरीय टीम के प्रमुख अधिकारी भी हैं।
एक बाल्टिक अधिकारी से बातचीत में कोल्बी ने एस्टोनिया के प्रधानमंत्री क्रिस्टजन मिहाल के बयान का हवाला दिया। सितंबर के आखिर में मिहाल ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आलोचना करते हुए उनकी तुलना 'कोने में फंसे चूहे' से की थी। अमेरिका ने चिंता जताई है कि ऐसे तीखे और भड़काऊ बयानों से रूस और आक्रामक हो सकता है और इलाके की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
अमेरिका की यह नई रणनीति ऐसे वक्त सामने आई है जब ट्रम्प प्रशासन रूस और यूक्रेन की जंग खत्म कराने के लिए बातचीत की नई प्रक्रिया पर काम कर रहा है। रूस पर लगी कुछ पाबंदियों में ढील देने के प्रस्तावों पर विचार हो रहा है, और रूसी ऊर्जा परियोजनाओं पर हमले रोकने के लिए यूक्रेन पर भी दबाव डाला जा रहा है। इन सब बातों से नाटो की एकजुटता पर खतरा मंडराता दिख रहा है।
रूस से पैदा होने वाले खतरे से सार्वजनिक तौर पर कैसे निपटा जाए, इस सवाल पर नाटो के अधिकारियों में दो साफ खेमे बन गए हैं। एक खेमे का मानना है कि रूस के खिलाफ लगातार चेतावनी देते रहने से मॉस्को के मन में डर बना रहता है। दूसरे खेमे की राय है, खासकर अमेरिका की, कि यूरोप के लोगों को बार-बार जंग का डर दिखाने के बजाय व्यावहारिक राजनीति करनी चाहिए, ताकि सुरक्षा पर होने वाला खर्च और तनाव काबू में रहे।
एक तरफ अमेरिका नरमी दिखा रहा है, तो दूसरी तरफ यूरोप में ऐसी तोड़फोड़ की घटनाओं से तनाव बना हुआ है जिनमें रूस के शामिल होने का शक है। जर्मनी में अहम फौजी और नागरिक ठिकानों में आग लगाने की साजिश के आरोप में दो बेलारूसी नागरिकों को हाल ही में गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा सितंबर में लाइपजिग/हाले हवाई अड्डे पर ड्रोन हमले की कोशिश के लिए जर्मनी ने सीधे रूस को जिम्मेदार ठहराया है। मॉस्को इन सभी आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है, फिर भी यूरोपीय देशों में रूस को लेकर डर बना हुआ है। ऐसे में अमेरिका की संयम रखने की सलाह यूरोपीय देशों को कितनी जंचेगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
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