शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

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सोवियत संघ ने 1961 में फोड़ा था दुनिया का सबसे बड़ा बम, 900 किमी दूर तक टूटे थे शीशे

सोवियत संघ ने 1961 में फोड़ा था दुनिया का सबसे बड़ा बम, 900 किमी दूर तक टूटे थे शीशे तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
दुनिया PT24 टीम

30 अक्टूबर 1961 को सोवियत संघ ने त्सार बॉम्बा नाम के हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया था। इंसान ने अब तक धरती पर इससे बड़ा बम नहीं आजमाया।

30 अक्टूबर 1961 का दिन इतिहास में एक ऐसे परीक्षण के लिए दर्ज है, जिसने तबाही की नई हद छू ली। इसी दिन सोवियत संघ (आज का रूस) ने दुनिया के इतिहास के सबसे ताकतवर हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया। इस बम को त्सार बॉम्बा के नाम से जाना जाता है। उस वक्त के सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने यह परीक्षण अमेरिका और पश्चिमी देशों को अपनी फौजी ताकत दिखाने के लिए करवाया था।

शुरुआत में इस विशाल बम की क्षमता 100 मेगाटन रखने की गुप्त योजना बनी थी। लेकिन 100 मेगाटन का धमाका होता तो हवा में फैलने वाला रेडियोएक्टिव कचरा (Radioactive Fallout) सोवियत जमीन समेत पूरे उत्तरी गोलार्ध के लिए खतरनाक साबित होता। यह खतरा भांपकर सोवियत वैज्ञानिकों ने बम के डिजाइन में जल्दी से बदलाव किए और क्षमता घटाकर 50 मेगाटन कर दी। फिर भी इंसान ने धरती पर आज तक जितने भी बमों का परीक्षण किया है, उनमें यह सबसे बड़ा और सबसे विनाशकारी रहा।

इस बेहद गोपनीय प्रोजेक्ट का शुरुआती कोडनेम इवान था। बाद में जब दुनिया को इसकी खबर लगी तो इतिहासकारों और लोगों ने इसे त्सार बॉम्बा कहना शुरू किया, जिसका रूसी भाषा में मतलब है बमों का राजा। यह थर्मोन्यूक्लियर हाइड्रोजन बम था और इसका धमाका करीब 5 करोड़ टन टीएनटी के बराबर था।

बम का आकार भी आम हथियारों जैसा नहीं था। वजन करीब 27 टन और लंबाई लगभग 8 मीटर थी। इसे ढोने के लिए सोवियत फौज के Tu-95 विमान में बड़े बदलाव करने पड़े। बम विमान में पूरा समा नहीं रहा था, इसलिए विमान का निचला हिस्सा खुला रखना पड़ा। परीक्षण के दिन इसे करीब 10 किलोमीटर की ऊंचाई से गिराया गया और जमीन से लगभग 4 किलोमीटर ऊपर इसका धमाका कराया गया।

धमाके के कुछ ही सेकंड में 8 किलोमीटर चौड़ा आग का गोला (Fireball) बन गया। मशरूम के आकार का विशाल बादल 60 किलोमीटर से भी ऊंचा उठकर वायुमंडल की स्ट्रैटोस्फियर परत तक जा पहुंचा। रोशनी इतनी तेज थी कि सैकड़ों किलोमीटर दूर से साफ दिखी, और 270 किलोमीटर के दायरे तक लोगों ने उसकी गर्मी महसूस की। धमाके से उठी हवा की शॉकवेव (Shockwave) ने पूरी धरती के तीन चक्कर लगाए। केंद्र से 900 किलोमीटर दूर मकानों और इमारतों की खिड़कियों के शीशे टूटने के आधिकारिक रिकॉर्ड मिलते हैं। कोई इसके पास होता तो एक सेकंड के भीतर खत्म हो जाता।

बम गिराने वाले विमान को सुरक्षित दूरी तक पहुंचने के लिए बहुत कम वक्त मिला था। उसे धमाके की लहर से बचाने के लिए बम में एक खास और बहुत बड़ा पैराशूट लगाया गया था। फिर भी झटका इतना जोरदार था कि विमान कुछ पल के लिए डगमगा गया। पायलट ने सूझबूझ से उस पर काबू पा लिया और विमान के क्रू के लोग बाल-बाल बचे।

यह बम असल में जंग में इस्तेमाल के लिए बना ही नहीं था। यह सोवियत संघ की सियासी और फौजी ताकत का ऐलान था। इसका आकार और वजन इतना ज्यादा था कि असली जंग में इसे इस्तेमाल करना बेहद मुश्किल होता। ऐसे बम को ढोने वाला विमान दुश्मन के रडार पर आसानी से आ जाता और हमले का आसान निशाना बनता। इसी वजह से सोवियत संघ ने इस बम का उत्पादन कभी आगे नहीं बढ़ाया।

इस परीक्षण ने दुनिया को परमाणु हथियारों की तबाही का गहरा एहसास कराया। अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे पश्चिमी देशों में इसके खिलाफ गुस्सा फैल गया। दुनिया भर के नेताओं को लगा कि आगे ऐसे परीक्षण धरती के वातावरण और इंसानी जिंदगी को खतरे में डाल सकते हैं। इसी दबाव और वैश्विक शांति की मांग के बीच 1963 में अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने मिलकर आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (Partial Test Ban Treaty, PTBT) पर दस्तखत किए। इस संधि के तहत वातावरण, अंतरिक्ष और पानी के नीचे हर तरह के परमाणु परीक्षण पर कानूनी रोक लगा दी गई।

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