ट्रम्प के रूस डीजल सौदे पर अमेरिकी सिनेट में फूट, 18 अक्टूबर की मियाद पर भारत की नजर
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के रूस के साथ डीजल करार पर वॉशिंगटन में रिपब्लिकन सिनेटर ही आमने-सामने हैं, और 18 अक्टूबर की समयसीमा भारत जैसे बड़े तेल खरीदार देशों के लिए अहम मानी जा रही है।
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस के साथ जो डीजल करार किया है, उसे लेकर वॉशिंगटन की राजनीति में जबरदस्त बहस छिड़ गई है। सबसे खास बात यह है कि मतभेद अमेरिकी सिनेट में खुद रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों और नेताओं के बीच खुलकर सामने आए हैं। रूस से कच्चा तेल और ईंधन खरीदने वाले देशों पर सख्त पाबंदियां लगाई जाएं या नहीं, इस पर अंतिम फैसले के लिए 18 अक्टूबर की समयसीमा तय है। इसी वजह से ट्रम्प के इस एक फैसले पर वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की नजर टिकी हुई है।
यह अंदरूनी खींचतान दो बड़े टीवी कार्यक्रमों में सामने आई, जहां रिपब्लिकन सिनेटरों ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय रखी। NBC की पत्रकार क्रिस्टन वेल्कर ने सीधा सवाल पूछा कि क्या ट्रम्प का डीजल करार 2022 के रूसी तेल प्रतिबंध कानून का सीधा उल्लंघन है। इस पर रिपब्लिकन सिनेटर थॉम टिलिस ने साफ कहा कि राष्ट्रपति ट्रम्प के संसद से पास मूल कानून और नीति का उल्लंघन करने की पूरी संभावना है।
नॉर्थ कैरोलिना के सिनेटर थॉम टिलिस ने याद दिलाया कि दिवंगत सिनेटर लिंडसे ग्रॅहम के नाम से जाने जाने वाले प्रतिबंध विधेयक पर जब सिनेट में वोटिंग हुई थी, तब सांसदों ने एक सुर में सख्त रुख का समर्थन किया था। टिलिस ने कहा, "मेरी याददाश्त के मुताबिक उस विधेयक को सिनेट में 86 वोट मिले थे। वह अमेरिकी सिनेट का एकमत फैसला था। लेकिन पिछले 24 घंटों में राष्ट्रपति की हरकतें और बयान इस कानून के मूल मकसद को ही कमजोर कर रहे हैं।"
इसके बाद सिनेटर टिलिस और सिनेट की विदेश संबंध समिति की वरिष्ठ डेमोक्रेटिक सदस्य जीन शाहीन की अगुवाई में कुल सात वरिष्ठ सिनेटरों ने एक संयुक्त बयान जारी किया। बयान में कहा गया कि डोनाल्ड ट्रम्प का फैसला अमेरिकी कांग्रेस के पास किए कानून के सीधे खिलाफ है, इसलिए व्हाइट हाउस और ट्रम्प प्रशासन को अपना यह विवादित रुख तुरंत वापस लेना चाहिए। इस बयान पर रिपब्लिकन सिनेटर सुसान कॉलिन्स, लिसा मुरकोव्स्की और जॉन कर्टिस के साथ डेमोक्रेटिक सिनेटर रिचर्ड ब्लुमेंथल और रॉन वायडेन के भी दस्तखत हैं।
दूसरी तरफ ट्रम्प के बचाव में सिनेट के रिपब्लिकन व्हिप जॉन बैरासो उतरे। CBS पर मार्गरेट ब्रेनन ने उनसे पूछा कि क्या राष्ट्रपति 18 अक्टूबर से पहले अपने ही मंजूर किए कानून का मजाक नहीं उड़ा रहे। जवाब में बैरासो ने कहा, "हमने यह कानून राष्ट्रपति के हाथ में एक अतिरिक्त अधिकार और हथियार के तौर पर दिया है, ताकि वे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर कूटनीतिक और आर्थिक दबाव डाल सकें।" उन्होंने बताया कि रूस को झुकाने और यूक्रेन-रूस इलाके में लंबे समय का हल निकालने के लिए डीजल करार को एक रणनीति की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
इस पूरी बहस में सिनेटरों ने भारत का नाम सीधे नहीं लिया, फिर भी 18 अक्टूबर की मियाद भारत के लिए बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। 18 सितंबर 2026 को लागू हुए 'लिंडसे ओ. ग्रॅहम रशिया एंड ईरान सैंक्शनिंग एक्ट 2026' की धारा 113 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार मिला है कि वे रूसी कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े खरीदार देशों पर 30 दिन के भीतर 100 फीसदी तक शुल्क (सेकेंडरी टैरिफ) लगा सकें।
भारत रूसी कच्चे तेल का दुनिया में दूसरे नंबर का सबसे बड़ा खरीदार है। इसलिए अगर ट्रम्प ने कानून को सख्ती से लागू करने का फैसला किया, तो भारतीय अर्थव्यवस्था और तेल रिफाइनरी कंपनियों पर भारी दबाव आ सकता है। हालांकि कानून में यह प्रावधान भी है कि अगर राष्ट्रपति अमेरिका के राष्ट्रीय हित का हवाला देकर कांग्रेस को प्रमाणित करें, तो वे किसी देश को इस शुल्क से छूट (वेवर) दे सकते हैं।
इसी बीच अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने एक इंटरव्यू में कहा कि ग्रॅहम कानून का गलत मतलब निकाला जा रहा है। उनके मुताबिक कानून की धारा 113 में सिर्फ कच्चा खनिज तेल (क्रूड ऑयल) और प्राकृतिक गैस शामिल हैं, और डीजल जैसे रिफाइंड ईंधन उत्पादों पर यह कानून सीधी रोक नहीं लगाता। अब सबकी नजर इस पर है कि 18 अक्टूबर को व्हाइट हाउस क्या रुख अपनाता है।