इस्रायल में बहुमत नहीं मिला तो सरकार बनाने के पांच रास्ते क्या हैं
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
इस्रायल में वोटिंग खत्म हो चुकी है और 4 नवंबर को आधिकारिक नतीजे घोषित किए जाने हैं। शुरुआती एक्जिट पोल के हिसाब से किसी भी एक पार्टी को साफ बहुमत मिलने की उम्मीद नहीं जताई गई है। इसी वजह से राजनीतिक गलियारों में नतीजों को लेकर खूब चर्चा है और पूरी दुनिया की नजर इस पर है कि त्रिशंकू संसद बनी तो नेताओं और राष्ट्रपति के सामने कौन से विकल्प बचेंगे।
इस्रायल की 120 सदस्यों वाली संसद का नाम क्नेसेट (Knesset) है। वहां सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। इस बार किसी भी पार्टी के लिए यह जादुई आंकड़ा छूना मुमकिन नहीं दिख रहा।
इस्रायल की व्यवस्था में सबसे बड़ी पार्टी बनना एक बात है और सरकार बनाना बिल्कुल दूसरी बात। वोटर सीधे प्रधानमंत्री को नहीं चुनते, वे पार्टियों को वोट देते हैं। नतीजे आने के बाद राष्ट्रपति आयझॅक हर्झोग संसद में चुनकर आई सभी पार्टियों के नेताओं से तफसील से बात करते हैं। फिर जिस नेता के पास 61 या उससे ज्यादा सांसदों का समर्थन जुटाने की सबसे अच्छी क्षमता दिखती है, उसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाता है। उस नेता को गठबंधन सरकार बनाने के लिए 28 दिन मिलते हैं और जरूरत पड़ने पर 14 दिन की मोहलत और मिल सकती है। इस दौरान सहमति नहीं बनी तो कई पेचीदा हालात खड़े हो सकते हैं।
अगर 4 नवंबर के नतीजों के बाद किसी पार्टी को साफ बहुमत नहीं मिला, तो पार्टियों के सामने पांच रास्ते बचेंगे।
पहला और सबसे ज्यादा संभावित रास्ता मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गुट का है। यह गुट छोटी और दक्षिणपंथी सोच वाली पार्टियों को साथ लेकर 61 सीटों का आंकड़ा पार करने की कोशिश कर सकता है। राष्ट्रपति ने भरोसा जताया तो वे फिर से गठबंधन सरकार बनाने का दावा कर सकते हैं।
दूसरा रास्ता विपक्षी पार्टियों की गोलबंदी का है, जिसमें गादी आयझेनकोट और दूसरे नेता शामिल बताए गए हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि विपक्षी पार्टियों में विचारों के मतभेद और आपसी होड़ बहुत ज्यादा है। सिर्फ नेतन्याहू-विरोधी एजेंडे पर सब एक हो भी जाएं, तो उनके लिए स्थिर बहुमत की गारंटी देना बहुत मुश्किल होता है।
तीसरे रास्ते में अरब पार्टियों का समर्थन या सहयोग लेना शामिल हो सकता है। शुरुआती अंदाज के मुताबिक अरब पार्टियों को इस चुनाव में अच्छी-खासी सीटें मिल सकती हैं, इसलिए सरकार बनाने में उनकी भूमिका किंगमेकर की हो सकती है। मगर दोनों बड़े राजनीतिक गुटों को अरब पार्टियों से हाथ मिलाने में तीखी वैचारिक और राजनीतिक अड़चनों का सामना करना पड़ता है।
चौथा विकल्प राष्ट्रीय एकता सरकार (National Unity Government) का है। इसमें देश के सामने खड़े संकटों से निपटने के लिए अलग-अलग विपक्षी और सत्ताधारी बड़ी पार्टियां साथ आकर सरकार बनाती हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री पद, मंत्रालयों के बंटवारे और नीतियों पर सहमति जरूरी होती है। तीखे मतभेदों की वजह से यह रास्ता चुनौती भरा है, फिर भी सियासी गतिरोध तोड़ने में असरदार हो सकता है।
पांचवां और आखिरी विकल्प अल्पमत सरकार (Minority Government) का हो सकता है। ऐसी सरकार के पास अपने 61 सांसद नहीं होते, मगर वह विश्वास प्रस्ताव या अहम विधेयकों के वक्त दूसरी पार्टियों का बाहरी समर्थन (Outside Support) लेकर टिकी रहती है। समर्थन देने वाली पार्टियों को लगातार मनाना पड़ता है, इसलिए ऐसी सरकार की स्थिरता पर हमेशा तलवार लटकी रहती है।
अगर सारी कोशिशें नाकाम रहीं तो क्या होगा, और क्या फिर चुनाव होंगे? राष्ट्रपति ने जिस नेता को मौका दिया, वह तय मुद्दत में बहुमत साबित न कर पाए तो राष्ट्रपति दूसरे नेता को मौका दे सकते हैं। इसमें भी नाकामी हाथ लगे तो संसद के 61 सदस्य मिलकर किसी और सांसद को सरकार बनाने का मौका देने की मांग कर सकते हैं। इस पूरी संवैधानिक प्रक्रिया के बाद भी किसी नेता या गठबंधन को बहुमत न मिले, तो मजबूरन संसद भंग करनी पड़ती है और देश में नए चुनाव का रास्ता खुल जाता है।
हालांकि बहुमत न होने का मतलब यह नहीं कि अगले ही दिन चुनाव हो जाएं। गठबंधन जोड़ने के लिए कानूनी और संसदीय स्तर पर हर मुमकिन कोशिश की जाती है। इस्रायल की हाल की सियासत देखें तो 2019 से 2022 के बीच सिर्फ तीन साल में देश ने लगातार पांच आम चुनाव देखे हैं। अप्रैल 2019, सितंबर 2019, मार्च 2020, मार्च 2021 और नवंबर 2022 के इन बार-बार हुए चुनावों से वहां की जनता और अर्थव्यवस्था को भारी राजनीतिक अस्थिरता झेलनी पड़ी थी।
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