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रूस का पहला डीजल टैंकर अमेरिका के लिए निकला, 7 नवंबर तक न्यूयॉर्क पहुंचने का अंदाजा

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने बताया कि करीब 40 हजार मीट्रिक टन डीजल लेकर जहाज रवाना हो गया है। यूक्रेन ने इस सौदे पर नाराजगी जताई है।

रूस का पहला डीजल टैंकर अमेरिका के लिए निकला, 7 नवंबर तक न्यूयॉर्क पहुंचने का अंदाजा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

रूस और अमेरिका के बीच अब ऊर्जा का कारोबार शुरू हो गया है। ये दोनों देश कई साल से एक-दूसरे से उलझते रहे और एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहे। अब दुनिया की राजनीति बदल रही है और इन्हीं दोनों के बीच सीधा, दोस्ताना व्यापार चलता दिख रहा है।

23 अक्टूबर को क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने बताया कि पहले टैंकर का सफर अमेरिका की तरफ शुरू हो चुका है। माल्टा का झंडा लगा जहाज Agioi Fanendes 22 अक्टूबर को रूस के प्रिमोर्स्क बंदरगाह से डीजल लेकर निकला। जहाज में करीब 40 हजार मीट्रिक टन अल्ट्रा लो सल्फर डीजल लदा है। अंदाजा है कि यह 7 नवंबर तक न्यूयॉर्क पहुंच जाएगा।

अभी तो रूस से सिर्फ एक ही जहाज अमेरिका की तरफ निकला है। इसलिए इस पर तुरंत कोई बड़ा नतीजा निकालना ठीक नहीं होगा। खासकर तब, जब बात डोनाल्ड ट्रम्प की हो। अब तक के उनके बयानों और रुख को देखकर अमेरिका की जनता ही नहीं, पूरी दुनिया मान चुकी है कि ट्रम्प पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

सवाल यह है कि हमेशा एक-दूसरे के खिलाफ रहने वाली ये दो बड़ी ताकतें अभी क्यों साथ आई हैं। इसका जवाब यह है कि दोनों ने जो जंग छेड़ी, वह उन्हीं पर भारी पड़ रही है। यह कारोबार कितने दिन चलता है, यह देखना जरूरी है, क्योंकि दुनिया की काफी राजनीति इसी पर टिकी है।

अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था। उसका असर यह हुआ कि होर्मुज बंद होने से अमेरिका में तेल के दाम बढ़ रहे हैं। इसका नुकसान ट्रम्प को आने वाले चुनावों में हो सकता है। इसी वजह से ट्रम्प भागदौड़ कर रहे हैं और उन्होंने रूस से तेल खरीदना शुरू कर दिया है। शुरू में ट्रम्प ने 3 लाख टन डीजल की सप्लाई का ऐलान किया था।

बाद में कहा गया कि नवंबर में 5 लाख टन और अगले चरण में 10 लाख टन की सप्लाई की योजना है। लेकिन जानकारों की राय है कि पहले टैंकर का तेल अमेरिका की रोज की खपत के मुकाबले बहुत कम है। इसलिए दामों पर बड़ा असर पड़ने की गुंजाइश कम है। दूसरी तरफ यूक्रेन ने रूस और अमेरिका के इस कारोबार पर नाराजगी जताई है।

इस सौदे से अमेरिका की दोहरी नीति एक बार फिर सामने आ गई है। रूस-यूक्रेन जंग की वजह से भारत पर रूस से सस्ता तेल लेने पर रोक लगवाई गई। दुनिया को वजह यह बताई गई कि भारत तेल लेगा तो रूस उसी पैसे से यूक्रेन पर हमले करेगा। भारत का सस्ता तेल बंद कराकर अब अमेरिका खुद रूस से तेल खरीदने लगा है।

अब चर्चा चल रही है कि जब अमेरिका सीधे रूस से तेल खरीद रहा है, तो क्या वह रूस को पैसे की जगह पत्थर दे रहा है। लोग कह रहे हैं कि अमेरिका का उसूल है कि नैतिकता वही, जो हम कहें, और अपने स्वार्थ के लिए वह पूरी दुनिया को दांव पर लगाने से भी पीछे नहीं हटेगा।

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