फरवरी से डीजल 67 फीसदी से ज्यादा महंगा, अमेरिकी किसानों की लागत बढ़ी
अमेरिका में डीजल और खाद के दाम चढ़ने से किसानों पर खर्च का बोझ बढ़ा है, जबकि फसल के दाम करीब 20 फीसदी ही बढ़े हैं।
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अमेरिका में खेती का खर्च तेजी से बढ़ गया है और इसका सीधा दबाव किसानों की कमाई पर पड़ रहा है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियां और उनके लगाए प्रतिबंध अब किसानों के लिए भी सिरदर्द बन गए हैं। डीजल और खाद की महंगाई ने किसानों की आमदनी पर असर डाला है, और खर्च बढ़ता देख वे सरकार की नीतियों पर सवाल भी उठाने लगे हैं।
ओहायो के सोयाबीन किसान डेविड शैक्ट के लिए इस साल फसल की कटाई करना महंगा सौदा साबित हो रहा है। उनकी हालत अमेरिकी किसानों की उस बड़ी परेशानी की एक मिसाल है, जो इस वक्त खेतों में कटाई के मौसम के बीच खड़ी है।
लागत बढ़ने की एक बड़ी वजह डीजल के दाम हैं। इसी महीने सोयाबीन, मक्का और दूसरी फसलों की कटाई शुरू होनी है। कंबाइन हार्वेस्टर और बाकी खेती के उपकरण चलाने के लिए बड़ी मात्रा में डीजल लगता है। फरवरी से अब तक डीजल के दाम 67 फीसदी से भी ज्यादा चढ़ चुके हैं, इसलिए किसानों पर सीधा बोझ पड़ रहा है। हालात ऐसे हैं कि खेती की जाए या नहीं, यह सवाल तक उठने लगा है।
सिर्फ डीजल ही नहीं, अगली फसल की बुवाई के लिए जरूरी कुछ खादों के दाम भी दोगुने हो गए हैं। ऐसे में किसानों के सामने दो चुनौतियां एक साथ खड़ी हैं। एक तरफ अगली फसल की तैयारी करनी है, दूसरी तरफ मौजूदा फसल की कटाई का खर्च निकालना है।
ऊर्जा और खाद के वैश्विक कारोबार के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य बेहद अहम है। वहां आई रुकावटों से यह सप्लाई बिगड़ी है और किसानों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष की वजह से ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ा है, जिसका असर ईंधन और खाद की कीमतों पर दिख रहा है।
खर्च बढ़ने के बावजूद किसानों को अपनी उपज से पर्याप्त कमाई नहीं हो रही। इस साल खेती की उपज के दाम करीब 20 फीसदी बढ़े हैं, जो डीजल और खाद की कीमतों में आई बढ़ोतरी से काफी कम है। किसानों का कहना है कि खर्च बढ़ने पर भी वे अपनी फसल खेत में यूं ही छोड़ना बर्दाश्त नहीं कर सकते। कटाई तो उन्हें हर हाल में पूरी करनी ही होगी। इसलिए बढ़ा हुआ खर्च झेलने के अलावा उनके पास गिने-चुने विकल्प ही बचे हैं।
कहा जा रहा है कि ट्रम्प प्रशासन ने किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ाया है और कई दूसरी चुनौतियां भी खड़ी की हैं। इसके बावजूद बताया जा रहा है कि किसान रिपब्लिकन पार्टी को दिया अपना समर्थन वापस लेने के बारे में अभी नहीं सोच रहे हैं, ऐसा खुद किसानों का कहना है। अब देखना होगा कि इन हालात का कारोबार पर आगे क्या असर पड़ता है।