बुलढाणा में प्रकाश आंबेडकर का बयान: किसान नालायक, मरना है तो 10-12 नेताओं को मारो
वंचित बहुजन आघाड़ी के प्रमुख प्रकाश आंबेडकर ने बुलढाणा में किसान आत्महत्या पर विवादित बात कही और सूखे व अमरावती शिक्षक चुनाव के खर्च पर भी सवाल उठाए।
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वंचित बहुजन आघाड़ी के प्रमुख प्रकाश आंबेडकर के एक बयान से राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है। बुलढाणा में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने किसान आत्महत्या के मुद्दे पर विवादित टिप्पणी की। उस वक्त राज्य में सूखे के हालात और किसान आत्महत्याओं का सवाल पहले से चर्चा में है।
आंबेडकर ने कई मुद्दों पर सरकार और राजनीतिक व्यवस्था को निशाने पर लिया। किसानों के वोट देने के तरीके से लेकर अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में हुए खर्च तक, उन्होंने अलग-अलग विषयों पर अपनी बात रखी। उनके कुछ बयानों के बाद सियासी चर्चा शुरू हो गई है।
आंबेडकर ने अफसोस जताया कि जो नेता किसानों के लिए ईमानदारी से लड़ते हैं, उन्हें भी किसान वोट नहीं देते। उन्होंने बुलढाणा में किसानों के सवालों पर लड़ रहे रविकांत तुपकर का जिक्र किया और चुनाव में वोट देने के तरीके की आलोचना की। इसी दौरान उन्होंने कहा, "किसान ही नालायक है, जो उनके लिए लड़ता है उसी को वोट नहीं देते।"
किसान आत्महत्याओं पर बोलते हुए उन्होंने इससे भी ज्यादा विवादित बात कही। आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों से मिलने नेताओं के जाने के तरीके पर भी उन्होंने सवाल उठाया। आंबेडकर के मुताबिक, जो लोग खुद अपनी जान दे देते हैं, उनके परिवार से मिलने किसी भी नेता को नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "मरना ही है तो 10-12 नेताओं को मारो और फिर मरो।" इस बयान पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर प्रतिक्रिया आने की संभावना है।
सूखे के हालात का जिक्र करते हुए आंबेडकर ने अनाज, पीने के पानी और जानवरों के चारे के इंतजाम को लेकर सरकार पर निशाना साधा। उनका आरोप है कि अल नीनो के संभावित असर की जानकारी पहले से थी, फिर भी पूरी तैयारी नहीं की गई।
उन्होंने सूखा प्रभावित लोगों से अपील की कि अगर उन्हें जरूरी मदद नहीं मिलती, तो वे मंत्रियों, विधायकों और सांसदों से जवाब मांगें। आंबेडकर ने यह भी कहा कि पर्यावरण का नुकसान और बारिश की कमी, दोनों मुद्दों को गंभीरता से लेने की जरूरत है।
अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव पर बोलते हुए आंबेडकर ने आरोप लगाया कि उम्मीदवारों ने वोट के लिए पैसे खर्च किए। उनका दावा है कि हर वोट के पीछे पांच हजार रुपये खर्च हुए। उन्होंने सवाल किया कि यह पैसा आखिर कहां से आया।
किसानों का संकट, सरकारी मदद का इंतजाम और चुनाव में कथित तौर पर पैसों का इस्तेमाल, ये मुद्दे एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। अब नजर इस पर है कि आंबेडकर के बयान पर संबंधित राजनीतिक नेता और प्रशासन क्या प्रतिक्रिया देते हैं, और चुनाव खर्च को लेकर कोई आधिकारिक जांच होती है या नहीं।
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