अदिस अबाबा में जयशंकर बोले, सुरक्षा परिषद में भारत और अफ्रीका की अनदेखी मंज़ूर नहीं
इथियोपिया की राजधानी में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों में देरी पर सवाल उठाए और अफ्रीका को स्थायी व अस्थायी, दोनों श्रेणियों में प्रतिनिधित्व देने की बात कही।
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भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने इथियोपिया की राजधानी अदिस अबाबा में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सुधारों को लेकर कड़ा रुख दिखाया। वे शहर के ऐतिहासिक अडवा मेमोरियल म्यूज़ियम में हुई एक खास सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जो देश सुरक्षा परिषद में बरसों से अटके सुधारों को जानबूझकर लटका रहे हैं, उनका रवैया ठीक नहीं है।
जयशंकर के मुताबिक आज की सुरक्षा परिषद आधुनिक दुनिया की असली तस्वीर पेश करने में पूरी तरह नाकाम रही है और वह इंसाफ़ के साथ सबका प्रतिनिधित्व नहीं करती। उन्होंने साफ़ कहा कि 21वीं सदी में वैश्विक फ़ैसलों की मेज़ पर भारत और अफ्रीका महाद्वीप का न होना, या कम नुमाइंदगी होना, बिल्कुल मंज़ूर नहीं है। पुरानी पड़ चुकी विश्व व्यवस्था की मार भारत और अफ्रीकी देशों को लगातार झेलनी पड़ रही है, और अब बहुपक्षीय संस्थाओं में जड़ से बदलाव का वक़्त आ गया है।
अपने भाषण में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा हालत पर भी बात की। उनका कहना था कि पिछले दस सालों में वैश्विक संकटों, जंगों और आर्थिक चुनौतियों के सामने यह संस्था बार-बार बेबस और बेअसर साबित हुई है। इसकी बड़ी वजह यह है कि सुरक्षा परिषद में दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं को ठीक से जगह नहीं मिली है।
जयशंकर ने यह भी कहा कि सुधारों का मकसद सिर्फ़ मौजूदा ढांचे में कुछ कुर्सियां या सीटें बढ़ा देना नहीं है। असली मक़सद वैश्विक शासन (Global Governance) को ज़्यादा लोकतांत्रिक, जवाबदेह और सही मायनों में प्रतिनिधि बनाना है। जब तक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सभी महाद्वीपों को वाजिब हिस्सा नहीं मिलता, तब तक संयुक्त राष्ट्र अपनी साख और कामकाज की ताक़त वापस नहीं पा सकेगा।
उन्होंने जी20 की मिसाल दी। 2023 में भारत की जी20 अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकन यूनियन (African Union) को इस बड़े वैश्विक मंच की स्थायी सदस्यता मिली थी, और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय कूटनीति की ऐतिहासिक भूमिका रही थी। जयशंकर ने कहा कि जो इंसाफ़ और उसूल जी20 में अफ्रीका को मिला, वही सुरक्षा परिषद के सुधारों पर भी लागू होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में अफ्रीका महाद्वीप को पूरा और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए।
भारत और अफ्रीका के रिश्तों पर उन्होंने कहा कि यह सिर्फ़ आज की कूटनीति नहीं है, इसके पीछे हज़ारों साल की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत है। दोनों इलाक़ों ने उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी और आज़ादी के बाद एक जैसी आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना किया। जयशंकर ने दोहराया कि अफ्रीका भारत की विदेश नीति में हमेशा सबसे ऊपर की प्राथमिकता पर रहा है और आगे भी रहेगा।
आगे की बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारत अपनी आज़ादी की 100वीं वर्षगांठ पर 2024 तक 'विकसित भारत' बनाने का सपना लेकर काम कर रहा है। उधर अफ्रीका महाद्वीप ने भी 'अजेंडा 2063' (Agenda 2063) के ज़रिए समृद्ध अफ्रीका की तस्वीर खींची है। उनके मुताबिक दोनों का यह साझा लक्ष्य सिर्फ़ अपने-अपने इलाक़ों का विकास नहीं करेगा, बल्कि दुनिया को ज़्यादा संतुलित और बहुध्रुवीय (Multipolar) बनाने में भी अहम योगदान देगा।
इसी दौरे में जयशंकर ने अदिस अबाबा में इथियोपिया के विदेश मंत्री से मुलाक़ात भी की। 9 अक्टूबर 2026 को उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि भारत और इथियोपिया की रणनीतिक साझेदारी साझा मूल्यों, साझा आकांक्षाओं और दक्षिण-दक्षिण एकजुटता की ऐतिहासिक भावना पर टिकी है। उनके मुताबिक द्विपक्षीय रिश्ते मज़बूत करने पर व्यापक बातचीत हुई, जिसमें व्यापार, निवेश, विकास परियोजनाएं, इन्फ्रास्ट्रक्चर, समुद्री मामले, सुरक्षा, तकनीक और संस्कृति शामिल थे। दोनों पक्षों ने वैश्विक घटनाक्रम पर नज़रिए साझा किए और बहुपक्षीय जुड़ाव तथा भारत-अफ्रीकन यूनियन साझेदारी को और मज़बूत करने पर भी बात की।