शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

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15:19 IST

गिरीश व्यास ने भाजपा छोड़ी, अनिल सोले के साथ खड़े, स्नातक चुनाव में बढ़ी खींचतान

नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में टिकट नहीं मिलने से नाराज पूर्व विधायक अनिल सोले के समर्थन में पूर्व विधायक गिरीश व्यास ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

गिरीश व्यास ने भाजपा छोड़ी, अनिल सोले के साथ खड़े, स्नातक चुनाव में बढ़ी खींचतान तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव से ठीक पहले भाजपा के घर की कलह सड़क पर आ गई है। पूर्व विधायक गिरीश व्यास ने पार्टी के सारे पदों से इस्तीफा दे दिया है और प्राथमिक सदस्यता भी छोड़ दी है। उन्होंने यह कदम पार्टी के बागी उम्मीदवार और पूर्व विधायक अनिल सोले का साथ देने के लिए उठाया है। सोले को इस बार पार्टी का टिकट नहीं मिला और वे निर्दलीय मैदान में हैं।

व्यास ने इस्तीफे की घोषणा उसी दिन की, जब उम्मीदवारों के लिए नाम वापस लेने की आखिरी तारीख थी। इससे साफ संदेश गया कि टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी के अंदर जो नाराजगी दबी हुई थी, वह अब सबके सामने है। भाजपा ने इस सीट पर सुधाकर कोहळे को अपना अधिकृत उम्मीदवार बनाया है और पार्टी नेतृत्व उनके साथ खड़ा है।

व्यास सिर्फ इस्तीफा देकर नहीं रुके। उन्होंने अपना दफ्तर सोले के प्रचार के लिए सौंप दिया है। बडकस चौक में बना यह दफ्तर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय के पास है और 8 अक्टूबर को इसका शुभारंभ हो चुका है। इस वजह से भी शहर में इसकी चर्चा तेज है। दफ्तर खुलने से यह इशारा भी मिला कि सोले मैदान में डटे रहने के मूड में हैं।

सोले को चुनाव से हटाने के लिए पार्टी की तरफ से कई कोशिशें हुईं। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने उनसे अपील की, और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण खुद उनके घर पहुंचे। बात नहीं बनी। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी बागी उम्मीदवारों से नाम लौटाने को कहा था और दलील दी थी कि पार्टी ने काबिल लोगों को मौका दिया है। चर्चा यह भी रही कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से सोले को समझाने का आग्रह किया गया।

अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए व्यास ने पार्टी के काम करने के ढंग पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि जिस पार्टी को खड़ा करने में उन्होंने अपनी जवानी खपा दी, घर-परिवार को पीछे रखा और छोटी-मोटी नौकरियां करके संगठन का काम किया, वही पार्टी बड़ा फैसला लेते समय कार्यकर्ताओं को भूल जाती है। उनके मुताबिक न कार्यकर्ताओं की राय ली जाती है, न मुख्य कार्यकर्ताओं को भरोसे में लिया जाता है, और कोई एक आदमी आकर फैसला सुना देता है।

व्यास का तर्क है कि पार्टी के नियम में उम्मीदवारी का ऐलान संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद होना चाहिए, फिर पदवीधर क्षेत्र में इतनी जल्दी नाम क्यों घोषित हुआ। उनके अनुसार यह भाजपा के अपने संविधान के खिलाफ है। नागपुर से टिकट चाहने वालों के नाम पहले संसदीय बोर्ड को भेजे जाने थे, पर ऐसा नहीं हुआ। इसी आधार पर उन्होंने कोहळे की उम्मीदवारी पर आपत्ति जताई। उन्होंने यह भी कहा कि कोहळे भी पार्टी के कार्यकर्ता हैं और वे खुद भी।

व्यास के मुताबिक उनकी लड़ाई इसलिए है कि पार्टी की अगली पीढ़ी को नुकसान न हो, और पुराने कार्यकर्ता चाहते हैं कि आगे से फैसले तय दायरे में रहकर हों। उन्होंने कहा कि वे यह तो नहीं कहेंगे कि पुराने कार्यकर्ताओं का दम घुट रहा है, लेकिन कई लोग बाद में आए और आगे निकल गए। दिखावा करना उन्हें कभी नहीं आया, और अगर पार्टी को वही चाहिए तो उन्हें भी अपना फैसला लेना पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि जो लोग पार्टी के खिलाफ काम करते हैं, उन्हें पदाधिकारी बना दिया जाता है। उन्होंने पूछा कि क्या बाकी कार्यकर्ता मर चुके हैं, क्या वे सक्रिय नहीं रहे, क्या उनकी ताकत खत्म हो गई। जिन्हें निष्ठावानों को किनारे करके पद दिए जाते हैं, उनमें खास क्षमता नहीं है, यह भी व्यास ने कहा।

गिरीश व्यास का नाम नागपुर भाजपा के पुराने संगठन वाले नेताओं में गिना जाता है। उनके पिता पंडित बच्छराज व्यास नागपुर में संघ और भारतीय जनसंघ से जुड़े प्रमुख नेता थे। संघ के संगठन के काम से शुरू करके वे जनसंघ के राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचे और 1965 के विजयवाड़ा अधिवेशन में भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। गिरीश व्यास ने भी संघ और भाजपा के संगठन में लंबे समय तक जिम्मेदारी निभाई। 2015 में भाजपा ने उन्हें नागपुर के स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद का उम्मीदवार बनाया था और वे निर्विरोध चुने गए थे। इसीलिए सोले के पक्ष में उनका इस्तीफा नागपुर भाजपा की अंदरूनी राजनीति के लिए बड़ी बात माना जा रहा है।

अब सवाल यह है कि इस बगावत का चुनावी गणित पर क्या असर होगा। भाजपा के वोट बंटे तो कांग्रेस उम्मीदवार और मौजूदा विधान परिषद सदस्य अभिजीत वंजारी के समीकरण पर इसका असर पड़ सकता है, हालांकि असली तस्वीर मतदान के दिन ही साफ होगी। पिछले चुनाव यानी 2020 में वंजारी जीते थे और भाजपा के संदीप जोशी 18,910 वोट के अंतर से पीछे रह गए थे। 2014 का नतीजा उलटा था, जब सोले ने कांग्रेस के डॉ. बबनराव तायवाडे को 31,259 वोट से मात दी थी और उन्हें कुल 52,485 वोट मिले थे।

सोले के दोबारा मैदान में उतरने और भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार कोहळे के चुनाव लड़ने से मुकाबला तिकोना होने की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक जानकार देख रहे हैं कि सोले की निर्दलीय उम्मीदवारी कोहळे की जीत की राह कितनी मुश्किल करती है और व्यास के जाने से पार्टी के समर्थक आधार पर क्या फर्क पड़ता है। कोहळे को टिकट, सोले की बगावत और अब व्यास का इस्तीफा, इन तीनों बातों ने चुनाव से पहले नागपुर भाजपा की एकजुटता की परीक्षा खड़ी कर दी है।

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