ट्रम्प की चेतावनी के बाद G7 देश बाजार में छोड़ेंगे 100 दशलक्ष बैरल तेल
ट्रम्प प्रशासन के दबाव के बाद G7 देश आपातकालीन भंडार से 100 दशलक्ष बैरल डीजल और कच्चा तेल बाजार में उतारने पर राजी हुए हैं।
बढ़ते ईंधन दामों को काबू में करने और दुनिया के ऊर्जा बाजार का तनाव घटाने के लिए ग्रुप ऑफ सेवन यानी G7 देशों ने बड़ा कदम उठाया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सीधे दबाव के बाद G7 के सभी सदस्य देश अपने आपातकालीन रणनीतिक भंडार से पूरे 100 दशलक्ष बैरल डीजल और कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में छोड़ने पर सहमत हो गए हैं।
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में ट्रम्प प्रशासन ने यह सख्त रुख अपनाया है, ताकि देश के अंदर ईंधन के दाम आसमान न छूने लगें। इस फैसले के साथ सभी सदस्य देशों ने मिलकर यह वादा भी किया है कि दुनिया भर में ऊर्जा के निर्यात पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगाई जाएगी।
पूरा तालमेल अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के जरिए होगा। इस फैसले के पीछे ट्रम्प प्रशासन की यूरोपियन यूनियन (EU) को दी गई कड़ी चेतावनी बताई गई है। ट्रम्प ने कहा था कि अगर यूरोप अपने खुद के आपातकालीन भंडार से डीजल की सप्लाई बढ़ाकर बाजार का दबाव कम नहीं करता, तो अमेरिका यूरोप को होने वाले डीजल के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा देगा।
यूरोप फिलहाल बड़े पैमाने पर अमेरिकी डीजल पर निर्भर है। अगर यह सप्लाई रुकी, तो यूरोपीय देशों में ईंधन की भारी किल्लत हो सकती है और उनकी अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद यूरोपियन यूनियन ने रूसी ईंधन पर अपनी निर्भरता घटाई थी। लेकिन इस बदलाव में यूरोप की निर्भरता अमेरिकी ईंधन पर, खासकर डीजल पर, काफी बढ़ गई। ट्रम्प प्रशासन के नए रुख से यूरोपीय देश बड़ी दुविधा में हैं। अगर अमेरिका ने डीजल निर्यात पर पाबंदी लगाई, तो यूरोप में ट्रांसपोर्ट, उद्योग और रोजमर्रा के ईंधन के दाम बहुत बढ़ जाएंगे। इसी खतरे को देखते हुए G7 देशों ने फौरन आपातकालीन भंडार से तेल खोलने का रास्ता चुना है।
ईंधन के दाम काबू में रखना सिर्फ यूरोप का ही नहीं, अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन का भी मुख्य राजनीतिक एजेंडा है। देश के बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम कम रहे, तो इसका सीधा राजनीतिक फायदा ट्रम्प को मिलेगा। इसीलिए दुनिया के बाजार में अतिरिक्त सप्लाई उतारकर कीमतें नीचे लाने की कोशिशें तेजी से चल रही हैं।
रणनीतिक भंडार (Strategic Petroleum Reserves) से तेल छोड़ने का यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले ईरान युद्ध और मध्य पूर्व में तीखे तनाव के बाद मार्च महीने में IEA की अगुवाई में रिकॉर्ड 400 दशलक्ष बैरल तेल छोड़ने का ऐतिहासिक समझौता हुआ था। यह इतिहास की सबसे बड़ी आपातकालीन तेल रिलीज रही।
हालांकि यह सवाल लगातार पूछा जा रहा था कि मार्च के उस समझौते का कितना तेल असल में बाजार में पहुंचा। IEA के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने हाल में दी जानकारी में बताया कि मार्च में मंजूर हुए 400 दशलक्ष बैरल में से करीब दो-तिहाई तेल अलग-अलग देशों में बांटा जा चुका है। यानी एक-तिहाई तेल का वितरण अब भी बाकी है। अब इस बचे हुए भंडार के साथ G7 की 100 दशलक्ष बैरल की नई अतिरिक्त सप्लाई जब बाजार में आएगी, तो दुनिया भर के कच्चे तेल के दामों पर कितना अच्छा असर पड़ता है, इस पर पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों और बाजार की नजर है।