कजाकिस्तान के घास के मैदान में करीब दो सदी बाद जन्मे प्रज़वाल्स्की घोड़े के दो बछड़े
दुनिया के इकलौते असली जंगली घोड़े की नस्ल के दो बछड़े कजाकिस्तान के खुले घास के मैदान में पैदा हुए हैं। वन्यजीव प्रेमी इसे जैवविविधता बचाने की बड़ी जीत मान रहे हैं।
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कजाकिस्तान के विशाल घास के मैदान से एक अच्छी खबर आई है। करीब दो सदी बाद वहां की खुली हवा में दुनिया के इकलौते असली जंगली घोड़े, यानी प्रज़वाल्स्की घोड़े (Przewalski's Horse), के दो बछड़े पैदा हुए हैं। इस नस्ल को इंसानी दखल, शिकार और खेती की वजह से अपने कुदरती ठिकाने से खत्म मान लिया गया था। इसकी वापसी को जैवविविधता की हिफाजत में सबसे बड़ी जीत माना जा रहा है और दुनिया भर के वन्यजीव प्रेमियों में नई उम्मीद जगी है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की रिपोर्ट के मुताबिक 22 अगस्त की सुबह कजाकिस्तान के अलिबी रिहैबिलिटेशन सेंटर (Alibi Rehabilitation Centre) और वन्यजीव अभयारण्य में 7 साल की एक प्रज़वाल्स्की घोड़ी ने बछड़े को जन्म दिया। विशेषज्ञों के मुताबिक इस खुले घास के मैदान में कुदरती तौर पर पैदा हुआ यह पिछली दो सदियों का पहला बछड़ा हो सकता है। इसके ठीक आठ दिन बाद 'उंब्रा' नाम की 6 साल की दूसरी घोड़ी ने एक और नर बछड़े को जन्म दिया।
इस मुहिम में दिन-रात लगे वन्यजीव संरक्षक अल्बर्ट सालेमगेरेयेव (Albert Salemgareyev) ने उस पल को भावुक अंदाज में बयान किया। 22 अगस्त की सुबह अभयारण्य के एक साथी का फोन आया तो वे कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना से अलिबी सेंटर के लिए निकल पड़े और करीब 12 घंटे का मुश्किल सफर तय किया। वहां पहुंचे तो बछड़ा अपनी मां के पास शांति से बैठा था और उसके नन्हे पैर अब भी जमीन पर लड़खड़ा रहे थे। अल्बर्ट ने कहा, "मेरे लिए वह बेहद भावुक पल था। यह सिर्फ एक घोड़ा या बछड़ा नहीं है, बल्कि कजाकिस्तान में एक नई पीढ़ी और समृद्ध प्रकृति की नई शुरुआत है।"
प्रज़वाल्स्की घोड़े धरती पर बचे एकमात्र असली जंगली घोड़े माने जाते हैं। आज जो घोड़े हम देखते हैं, उनमें से ज्यादातर पालतू नस्लों से आए हैं, लेकिन प्रज़वाल्स्की घोड़ों के जीन और डीएनए उन मूल जंगली जानवरों के हैं जिन्हें इंसान ने कभी पालतू नहीं बनाया। इनका शरीर छोटा मगर बेहद मजबूत होता है, गर्दन पर खड़ी अकड़ी हुई अयाल होती है और कड़ाके की सर्दी में बदन की गर्मी बचाए रखने की खास काबिलियत भी इनमें है।
मध्य एशिया के फैले हुए घास के मैदानों में कभी ये घोड़े हजारों की तादाद में खुले घूमते थे। 19वीं सदी के आखिर में इनकी संख्या तेजी से घटने लगी। 1900 के दशक के बीच तक इंसानी दखल बढ़ा तो इनका सफाया शुरू हो गया। बेरोकटोक शिकार, खेती और पशुपालन के लिए घास के मैदान का उजड़ना और पालतू जानवरों से चारे की होड़ ने इनके झुंड धीरे-धीरे खत्म कर दिए। 1969 में गोबी के रेगिस्तान में ये आखिरी बार कुदरती माहौल में खुले घूमते दिखे थे। उसके बाद ये जंगल से पूरी तरह गायब हो गए और सिर्फ चिड़ियाघरों के पिंजरों तक सिमट कर रह गए।
गनीमत यह रही कि यूरोप के कुछ बड़े चिड़ियाघरों में ये घोड़े महफूज रखे गए थे। वहां वैज्ञानिकों ने सोच-समझकर प्रजनन का कार्यक्रम चलाया और इनका जेनेटिक पूल बचाए रखा।
2024 से कजाकिस्तान सरकार ने यूरोपीय चिड़ियाघरों के सहयोग से इन घोड़ों को उनकी पुरानी जमीन पर लौटाने की बड़ी योजना शुरू की। पहले चरण में यूरोप से 22 प्रज़वाल्स्की घोड़े हवाई जहाज से अलिबी रिहैबिलिटेशन सेंटर लाए गए। यहां की आबोहवा में ढलने के लिए उन्हें खास निगरानी में रखा गया। योजना है कि 2029 तक कुल 40 घोड़ों को चरणों में कजाकिस्तान के घास के मैदान में खुला छोड़ा जाए।
यूरोप से लाए गए इन घोड़ों ने कजाकिस्तान के कुदरती माहौल में बिना घबराए खुद को ढाल लिया और कुछ ही महीनों में दो नए बछड़ों को जन्म दिया। इससे साफ है कि वहां की मिट्टी और घास का मैदान इस दुर्लभ नस्ल की वंशावली के लिए फिर से सुरक्षित और अनुकूल हो गए हैं। यह घटना दिखाती है कि इंसान ठान ले और वैज्ञानिक नजरिए से ईमानदार कोशिश करे, तो खत्म होने की कगार पर पहुंची प्रजातियों को भी नई जिंदगी दी जा सकती है।