ओबीसी क्रीमीलेयर का फैसला टालने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, केंद्र को बड़ा धक्का
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 के फैसले पर अमल दो साल टालने की केंद्र सरकार की मांग खारिज कर दी है।
नागपुर: ओबीसी आरक्षण में क्रीमीलेयर तय करने से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल दो साल टालने की केंद्र सरकार की मांग कोर्ट ने खारिज कर दी है। 11 मार्च 2026 को दिए फैसले को लागू करने का निर्देश देते हुए कोर्ट ने उसे सिर्फ आगे की भर्तियों पर लागू करने की मांग भी नहीं मानी। इसलिए यूपीएससी की 2025 की सिविल सर्विस परीक्षा के 958 उम्मीदवारों का सेवा आवंटन नए मानदंडों से ही होगा।
मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि ओबीसी क्रीमीलेयर तय करते वक्त माता-पिता का वेतन या आमदनी ही अकेला पैमाना नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा था कि माता-पिता का पद, उसकी श्रेणी और सामाजिक दर्जा भी देखना जरूरी है।
केंद्र सरकार ने भर्ती प्रक्रिया, सीनियरिटी और पदोन्नति पर असर की आशंका जताते हुए दो साल की मोहलत मांगी थी। केंद्र के मुताबिक 2016 से 2025 के बीच भरे गए पाँच लाख 69 हजार से ज्यादा आरक्षित पदों पर इसका असर हो सकता है। इसलिए उसने पदों की समकक्षता तय करने के लिए वक्त और पुराने मानदंडों के तहत हुई प्रक्रियाओं को सुरक्षा देने की मांग की थी।
न्यायमूर्ति पामिदिर्घतम श्री नरसिंह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की बेंच ने केंद्र की प्रमुख मांगें खारिज कर दीं। बेंच ने साफ किया कि 11 मार्च से पहले पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाएं और नियुक्तियां दोबारा नहीं खोली जाएंगी। उससे पहले की सीनियरिटी और पदोन्नति भी सुरक्षित रहेगी। मिलती-जुलती हालत वाले लोगों के लंबित दावे संबंधित अदालतें और प्राधिकरण अलग-अलग देखेंगे।
कोर्ट ने 958 उम्मीदवारों का सेवा आवंटन 11 मार्च के फैसले के हिसाब से ही करने को कहा है। मूल फैसले पर अमल के लिए केंद्र सरकार को आठ हफ्ते की मोहलत दी गई है। यानी क्रीमीलेयर के मानदंडों को लेकर केंद्र को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत नहीं मिली है।
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