शनिवार, 7 नवंबर 2026

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बेदखल काश्तकारों को जमीन का हक देने के लिए काश्तकारी कानून में सुधार को सिद्धांत रूप में मंजूरी

बेदखल काश्तकारों को जमीन का हक देने के लिए काश्तकारी कानून में सुधार को सिद्धांत रूप में मंजूरी तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 टीम

श्रमजीवी संगठन के मोर्चे के बाद मंत्रालय में हुई बैठक में राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने पालघर के डहाणू और तलासरी के बेदखल काश्तकारों के लिए काश्तकार कानून में सुधार को सैद्धांतिक तौर पर मंजूरी दी।

पालघर जिले के डहाणू और तलासरी इलाके के बेदखल काश्तकारों को जमीन का हक दिलाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ा है। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने काश्तकारी कानून में जरूरी सुधार करने को सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी है। यह मंजूरी मंत्रालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में दी गई।

यह बैठक श्रमजीवी संगठन की तरफ से निकाले गए 'संविधान हक संघर्ष मोर्चा' की पृष्ठभूमि में बुलाई गई थी। बैठक की अध्यक्षता बावनकुले ने की। बैठक में तय हुआ कि जो बंजर जमीनें असल में लोग जोतते आ रहे हैं, उन्हें जोतने वालों के नाम किया जाए और इसके लिए काश्तकारी कानून में सुधार किया जाए।

बैठक में विधायक स्नेहा दुबे पंडित, श्रमजीवी संगठन की अध्यक्षा सीता घाटाल, बालाराम भोईर और विजय जाधव समेत संगठन के कई प्रमुख पदाधिकारी मौजूद थे।

पीढ़ियों से जमीन जोतने के बावजूद सिर्फ अधिकृत प्रविष्टियों यानी रिकॉर्ड न होने की वजह से हजारों मेहनतकश आदिवासी परिवार कानूनी हक से वंचित रह गए हैं। ऐसे परिवारों के लिए यह सुधार बहुत अहम होगा।

जमीन के सवाल के अलावा बैठक में और भी मुद्दों पर विस्तार से बात हुई। इनमें पेंडिंग वनाधिकार दावों का तेजी से निपटारा, बेगारी से छूटे लोगों का पुनर्वास, गांव आबादी का विस्तार, और आधार कार्ड व जन्म प्रमाणपत्र बनवाते वक्त आने वाली पेचीदा अड़चनें शामिल थीं।

गांव आबादी विस्तार योजना में उन भूमिहीन कातकरी परिवारों का खास ख्याल रखने का भी बैठक में तय हुआ, जो रोजगार के लिए बार-बार ईंट भट्ठों पर जाते रहते हैं। एक ही गांव में लगातार रहने का सबूत न होने की वजह से उन्हें घर की जगह से वंचित न रखा जाए, इसके लिए मूल अधिसूचना में जरूरी सुधार करने की मांग सरकार ने मान ली है।

राजस्व मंत्री ने साफ निर्देश दिए कि अलग-अलग विभागों के तालमेल की कमी या कागजात की उलझन की वजह से कोई भी गरीब लाभार्थी योजनाओं से बाहर न रह जाए। इसके लिए आसान कार्यप्रणाली बनाई जाए और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए।

राज्यस्तरीय आदिवासी विकास समीक्षा समिति के अध्यक्ष (मंत्री दर्जा) विवेक पंडित ने ठोस रुख रखते हुए कहा कि मोर्चे से मिले सरकारी निर्णय सिर्फ कागज पर नहीं रहने चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक पात्र परिवारों को असल में जमीन का हक, पक्का घर और प्रमाणपत्र नहीं मिल जाते, संगठन की लड़ाई जारी रहेगी।

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