जवानों की निजी गाड़ियों को टोल से छूट देने पर केंद्र सरकार का विचार
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रोड ट्रांसपोर्ट और हाईवे मंत्रालय रक्षा मंत्रालय से बात कर रहा है ताकि बैरियर-लेस टोल में सेना के जवानों की निजी गाड़ियों से पैसे न कटें।
देश की सुरक्षा में लगे करीब 14 लाख सक्रिय सैनिकों के लिए अच्छी खबर के संकेत हैं। उनकी निजी गाड़ियों को टोल से पूरी छूट मिलने का रास्ता खुलता दिख रहा है। हाईवे पर डिजिटल व्यवस्था बदल रही है और उससे जवानों को जो बेवजह परेशानी हो रही है, उसे दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने कदम उठाए हैं। रोड ट्रांसपोर्ट और हाईवे मंत्रालय इस मामले पर गंभीरता से सोच रहा है।
पूरे देश में धीरे-धीरे 'मल्टी-लेन फ्री फ्लो' (MLFF) यानी बैरियर-लेस टोल सिस्टम लागू किया जा रहा है। इस नई व्यवस्था में सड़कों पर ऑटोमैटिक नंबर प्लेट कैमरे और RFID रीडर लगे होते हैं। ये तेज रफ्तार से गुजरती गाड़ियों का टोल अपने आप काट लेते हैं।
दिक्कत यह है कि इस ऑटोमैटिक सिस्टम में सेना के जवानों की निजी गाड़ियों से भी नियमों के हिसाब से पैसे कट रहे हैं। कई लोगों को ई-चालान का सामना भी करना पड़ रहा है। पहले जवान टोल नाके पर अपना पहचान पत्र दिखाकर आसानी से निकल जाते थे। नए डिजिटल सिस्टम में इंसान के हाथों होने वाली यह जांच बंद हो गई है और इसी वजह से यह उलझन पैदा हुई है।
इस तकनीकी अड़चन को दूर करने के लिए रोड ट्रांसपोर्ट मंत्रालय ने सीधे रक्षा मंत्रालय से बातचीत शुरू कर दी है। मकसद यह है कि जवानों की निजी गाड़ियों को कोई परेशानी न हो और उनके खाते से टोल का खर्च भी न कटे। इसके लिए दो मुख्य विकल्पों पर विचार चल रहा है।
पहला विकल्प यह है कि गाड़ियों को एक खास 'फास्टैग' दिया जाए, जो सिर्फ आवाजाही दर्ज करेगा, लेकिन खाते से पैसे नहीं काटेगा। दूसरा विकल्प यह है कि सालाना फास्टैग पास पर होने वाला खर्च रक्षा मंत्रालय की तरफ से वापस किया जाए। हालांकि इस पास का आर्थिक बोझ आखिर कौन उठाएगा, इस पर अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है।
सूत्रों की जानकारी के मुताबिक, साल 2028 तक देश के करीब 1,150 से ज्यादा टोल प्लाजा को पूरी तरह इस नए 'मल्टी-लेन फ्री फ्लो' सिस्टम के तहत लाने का लक्ष्य है। इस काम में उम्मीद से कुछ देर हो रही है। फिर भी आगे चलकर डिजिटल भीड़ और ई-चालान की परेशानी से बचने के लिए सैन्य कर्मचारियों को पहले से ही इस व्यवस्था से छूट देने की योजना बनाई जा रही है।
लेकिन 14 लाख सैनिकों की संख्या देखें तो मामला आसान नहीं है। फिलहाल यह पास 3,075 रुपये सालाना का है। अगर इसे सभी निजी गाड़ियों पर लागू किया गया, तो सरकार या संबंधित विभाग पर बड़ा आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इसलिए सबकी नजर इस पर है कि बीच का क्या रास्ता निकाला जाता है।
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