पूर्व CMO डॉ. पवनकुमार उइके की जमानत अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा
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हाई कोर्ट से नियमित जमानत नहीं मिलने के बाद नागपुर के पूर्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है।
नागपुर के पूर्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. पवनकुमार उइके की जमानत का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को नोटिस भेजकर इस पर जवाब देने को कहा है।
डॉ. उइके पर पुलिस ने नक्सलियों से कनेक्शन के आरोप में फौजदारी कार्रवाई की है। हाई कोर्ट ने उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसी फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका यानी एसएलपी दायर की।
याचिका पर सुनवाई न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायाधीश शील नागु की बेंच ने की। बेंच ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ता डॉक्टर की तरफ से अधिवक्ता मनन डागा और अधिवक्ता राजेन्द्र डागा ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता धर्माधिकारी पेश हुए।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक 28 जुलाई 2022 की रात गढ़चिरोली जिले में नक्सली "शहीद सप्ताह" के दौरान एसआरपीएफ और सीआरपीएफ की पुलिस टुकड़ी गश्त पर थी। गश्त में कमलापुर इलाके से डॉ. पवनकुमार उइके, एम्बुलेंस ड्राइवर प्रफुल भट और व्यापारी अनिल भट को पकड़ा गया था।
पुलिस का दावा है कि इन लोगों के पास मौजूद बैग से प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के बैनर और प्रचार पर्चे मिले। इस सिलसिले में मामला दर्ज हुआ और तीनों को 28 जुलाई 2022 को ही गिरफ्तार कर लिया गया।
जांच पूरी होने पर पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया, जिसमें आरोपियों पर अलग-अलग धाराओं में आरोप लगाए गए हैं। पुलिस ने दावा किया कि डॉ. पवनकुमार के पास से लैपटॉप, मोबाइल, मेमोरी कार्ड, प्रिंटर और नक्सली साहित्य जब्त हुआ। पुलिस का यह भी आरोप है कि उन्होंने अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से वाकी-टॉकी, जीपीएस, इलेक्ट्रॉनिक सामान, दवाइयां और दूसरी चीजें मंगवाईं और अहेरी दलम के नक्सली कमांडरों तक पहुंचाईं। पुलिस के मुताबिक उन्होंने इन कमांडरों का इलाज भी किया।
याचिकाकर्ता के वकील मनन डागा ने कोर्ट में कहा कि आरोपी 4 साल से ज्यादा वक्त से हिरासत में है। मुकदमे में अभी 39 गवाहों की जांच बाकी है, इसलिए ट्रायल जल्द खत्म होने की कोई उम्मीद नहीं है।
याचिका में दलील दी गई है कि यूएपीए के मामलों में ट्रायल में बहुत ज्यादा देरी और लंबी कैद के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों को देखते हुए आरोपी जमानत का हकदार है। याचिका के मुताबिक इस मामले के दो और सह-आरोपियों, प्रफुल भट और अनिल भट, को हाई कोर्ट पहले ही जमानत दे चुका है।
आरोपी की तरफ से यह भी कहा गया कि वह सिर्फ सरकारी चिकित्सा अधिकारी के तौर पर अपनी ड्यूटी निभा रहे थे और मरीजों का इलाज कर रहे थे। उनका कोई आपराधिक इरादा नहीं था।
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