कम नींद और सोने का बिगड़ा टाइम: क्या बढ़ सकता है स्ट्रोक का खतरा, डॉक्टर ने बताया
डॉ. अरविंद बडिगर के मुताबिक नींद की कमी का असर थकान तक सीमित नहीं रहता, दिल और रक्तवाहिनियों की सेहत पर भी पड़ सकता है।
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काम की वजह से देर हो जाना या दिन भर की भागदौड़ के बाद थक जाना, ऐसे में सबसे पहले हम नींद को नज़रअंदाज़ करते हैं। रात में मोबाइल पर एक घंटा और बिता देना या रोज़ अलग-अलग टाइम पर सोना बड़ी समस्या नहीं लगती। कई लोगों को लगता है कि हफ्ते के आखिर में ज़्यादा सो लेने से कमी पूरी हो जाएगी। लेकिन कम नींद अगर रोज़ की आदत बन जाए, तो इसका असर सिर्फ थकान तक नहीं रहता, दिल और रक्तवाहिनियों की सेहत पर भी पड़ सकता है।
इस बारे में बीडीआर फार्मास्युटिकल्स इंटरनेशनल प्रा. लि. के टेक्निकल डायरेक्टर डॉ. अरविंद बडिगर ने विस्तार से जानकारी दी है। उनके मुताबिक कभी-कभार किसी रात देर तक जागने से स्ट्रोक नहीं आता। चिंता की बात यह है कि शरीर को बार-बार पूरी और गहरी नींद न मिले।
नींद और ब्लड प्रेशर के रिश्ते पर डॉ. बडिगर ने कहा कि आम नींद के दौरान ब्लड प्रेशर कम हो जाता है। इससे दिन भर के तनाव के बाद दिल और रक्तवाहिनियों को आराम मिलता है। लेकिन बार-बार नींद टूटे या पूरी नींद न मिले, तो यह कुदरती प्रक्रिया बिगड़ सकती है। कम नींद का संबंध बढ़े हुए ब्लड प्रेशर, शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन) और आगे चलकर ब्लड शुगर के नियंत्रण के बिगड़ने से जोड़ा गया है।
डॉ. बडिगर के अनुसार हाई ब्लड प्रेशर स्ट्रोक के सबसे अहम जोखिम कारकों में से एक है। लंबे वक्त तक ब्लड प्रेशर बढ़ा रहे तो रक्तवाहिनियों को नुकसान हो सकता है और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। रक्तवाहिनी में रुकावट से होने वाले स्ट्रोक को इस्केमिक स्ट्रोक कहते हैं, जबकि दिमाग में खून बहने से होने वाले स्ट्रोक को हेमरेजिक स्ट्रोक कहा जाता है।
उन्होंने ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया को भी चिंता की बात बताया। इसमें सोते वक्त सांस लेने की प्रक्रिया बार-बार कुछ देर के लिए रुक जाती है, जिससे दिल और रक्तवाहिनियों पर अतिरिक्त दबाव आ सकता है। इसलिए नींद से जुड़े विकारों की पहचान और सही इलाज सेहत के कुल इंतज़ाम का अहम हिस्सा है।
सोने के टाइम के बारे में डॉ. बडिगर ने बताया कि नींद की अवधि इस मामले का सिर्फ एक पहलू है। शरीर की अंदरूनी जैविक घड़ी को सर्केडियन रिदम कहते हैं, जो नींद, हार्मोन के रिसाव और शरीर की कई दूसरी प्रक्रियाओं को संभालने में मदद करती है। सोने और जागने का टाइम बार-बार बदले तो यह लय बिगड़ सकती है। अगर इसके साथ नींद भी कम हो रही हो, तो असर ज़्यादा महसूस हो सकता है।
उनके मुताबिक कुछ अध्ययनों में सोने के अनियमित टाइम का संबंध हाई ब्लड प्रेशर, मोटापे और दिल व रक्तवाहिनियों से जुड़े दूसरे जोखिम कारकों से पाया गया है। मगर यह संबंध पेचीदा है। कम या खराब नींद का मतलब यह नहीं कि स्ट्रोक होगा ही। नींद की कमी से दिखने वाले जोखिम में से कितना सीधे नींद से जुड़ा है और कितना सेहत या लाइफस्टाइल के दूसरे कारणों से, इसका अध्ययन शोधकर्ता अभी भी कर रहे हैं।
डॉ. बडिगर ने कहा कि इससे यह मतलब नहीं निकलता कि हर किसी को तय टाइम पर ही सोना चाहिए। इसके बजाय, सोने और जागने का टाइम हो सके तो नियमित रखना और पूरी नींद लेना लंबे वक्त की सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है।
डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए, इस पर उन्होंने कहा कि नियमित रूप से तेज़ खर्राटे लेना, नींद में सांस के लिए हांफना, दूसरों का यह देखना कि सोते वक्त सांस कुछ देर रुक गई, और दिन में बहुत ज़्यादा नींद आना, इन लक्षणों को सिर्फ थकान समझकर नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। ये स्लीप एप्निया के लक्षण हो सकते हैं, इसलिए डॉक्टर से सही जांच करवाना ज़रूरी है। इसी तरह लंबे वक्त से नींद न आने की तकलीफ हो और उससे रोज़ के काम पर असर पड़ रहा हो, तो भी उसे अनदेखा नहीं करना चाहिए और सही इलाज लेना ज़रूरी है।
डॉ. बडिगर के मुताबिक ज़्यादातर बालिगों को रोज़ सात से नौ घंटे की नींद चाहिए होती है। सोने और जागने का टाइम नियमित रखना, दिन के आखिरी हिस्से में कैफीन कम लेना, शारीरिक हलचल और कसरत करना और सोने के लिए आरामदायक माहौल बनाना, ये आदतें अच्छी नींद में मदद कर सकती हैं।
स्ट्रोक से बचाव में ब्लड प्रेशर काबू में रखना, डायबिटीज़ का सही इंतज़ाम, संतुलित खान-पान, नियमित कसरत और धूम्रपान से परहेज़ अहम माने गए हैं। डॉ. बडिगर ने कहा कि पूरी नींद पर भी उतना ही ध्यान देना ज़रूरी है। दिन भर का तनाव कितना होगा, यह हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन रोज़ पूरा आराम लेना एक अहम आदत है जो हमारे नियंत्रण में है।
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