बच्चों में चिकनपॉक्स: दूसरे साल में टीका क्यों जरूरी, डॉ. अनिश पिल्लई ने बताया
नवी मुंबई के मदरहूड हॉस्पिटल के डॉ. अनिश पिल्लई ने बच्चों को छोटी माता यानी चिकनपॉक्स से बचाने के बारे में जानकारी दी।
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बच्चे की ज़िंदगी का दूसरा साल उसके विकास का बहुत अहम दौर होता है। 12 से 24 महीने की उम्र के बीच बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बन रही होती है। इसी दौरान प्ले-ग्रुप, डे-केयर, परिवार के मेल-मिलाप, सफर और सार्वजनिक जगहों पर जाने से उसका मिलना-जुलना भी बढ़ता है।
बच्चे जब ज्यादा लोगों के संपर्क में आते हैं, तो संक्रामक बीमारियां लगने का खतरा भी बढ़ सकता है। छोटी माता (चिकनपॉक्स) ऐसी ही एक संक्रामक बीमारी है, जिस पर पेरेंट्स को खास ध्यान देना जरूरी है। बच्चों को छोटी माता से कैसे बचाया जाए, इसकी जानकारी नवी मुंबई के मदरहूड हॉस्पिटल में नियोनेटोलॉजी और पेडियाट्रिक्स के लीड कंसल्टेंट डॉ. अनिश पिल्लई ने दी है।
डॉ. पिल्लई के मुताबिक छोटी माता बहुत संक्रामक बीमारी है। यह बीमार व्यक्ति के करीबी संपर्क में आने से और हवा में मौजूद बूंदों (ड्रॉपलेट्स) के जरिए आसानी से फैलती है। इसमें आम तौर पर खुजली वाले दाने, पानी से भरे फोड़े (ब्लिस्टर्स), बुखार और बेचैनी महसूस होती है।
डॉ. पिल्लई ने बताया कि कुछ केसेस में शरीर पर निशान या दाग रह सकते हैं, और उनका मानसिक असर बीमारी ठीक होने के बाद भी लंबे समय तक बना रह सकता है। बीमारी से रोज की दिनचर्या भी बिगड़ती है, क्योंकि ठीक होने तक बच्चों को डे-केयर और दूसरी सामाजिक गतिविधियों से दूर रहना पड़ता है। इसका असर पेरेंट्स और देखभाल करने वालों पर भी पड़ता है।
डॉ. पिल्लई के अनुसार ज्यादातर बच्चे इस बीमारी से पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, लेकिन कभी-कभी छोटी माता से डिहाइड्रेशन, न्यूमोनिया और लिवर की दिक्कतों जैसी गंभीर पेचीदगियां भी हो सकती हैं।
इसी वजह से डॉ. पिल्लई का कहना है कि पेरेंट्स को बच्चों की हिफाजत के लिए उम्र के हिसाब से वक्त पर टीका लगवाना चाहिए। छोटी माता को सिर्फ "बच्चों की आम बीमारी" मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उनके मुताबिक यह ऐसा संक्रमण है जिसकी रोकथाम हो सकती है, और यह बच्चे की सेहत, रोज की दिनचर्या और परिवार की जिंदगी पर असर डाल सकता है। बच्चे को संक्रमण होने का इंतजार करने के बजाय पेरेंट्स को सुझाए गए टीकाकरण के शेड्यूल के बारे में पेडियाट्रिशियन से वक्त रहते बात करनी चाहिए।
डॉ. पिल्लई ने यह भी कहा कि बच्चे का एक साल पूरा होने के बाद पेरेंट्स टीके की तरफ ध्यान देना भूल सकते हैं, खासकर जब बच्चा तंदुरुस्त दिखता है और डॉक्टर के पास जाना कम हो जाता है। दूसरे साल में लगने वाले टीके छूट जाएं या देर से लगें, तो सुरक्षा में कमी रह सकती है।
छोटी माता के लिए सुझाया गया टीकाकरण आम तौर पर दो डोज़ का होता है। पहला डोज़ 15वें महीने में और दूसरा डोज़ 18वें महीने में दिया जाता है। डॉ. पिल्लई के मुताबिक सुझाए गए शेड्यूल का सख्ती से पालन करके पेरेंट्स बच्चों को उन बीमारियों से बचा सकते हैं जिनकी टीकों से रोकथाम हो सकती है, और उनकी सेहतमंद बढ़वार में मदद कर सकते हैं।
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