दिवाली की सुबह संगीत की महफिल: क्या है दिवाली भोर और डोंबिवली में क्यों बढ़ रहा है इसका चलन
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दिवाली की तड़के होने वाली संगीत महफिलों का चलन महाराष्ट्र में बढ़ रहा है। डोंबिवली में इसका खास जोश दिखता है, जहां संस्थाएं और मंडल ये कार्यक्रम करते हैं।
दिवाली खुशी, उमंग और शुभ का त्योहार है। इसके हर दिन की अपनी अहमियत है, फिर भी दिवाली की सुबह कुछ अलग ही होती है। सुबह का अभ्यंग स्नान, आंगन की रंगोली, दीयों की रोशनी और उबटन की खुशबू माहौल को खिला देती है।
पिछले कुछ सालों में दिवाली की सुबह मनाने की एक खूबसूरत परंपरा जड़ पकड़ रही है, जिसे दिवाली भोर कहा जाता है। इसकी लोकप्रियता महाराष्ट्र को एक बार फिर सांस्कृतिक राह पर ले जा रही है। इस दिन तड़के लोग संगीत की महफिल, भक्तिगीत, सुगम संगीत और पारंपरिक गानों का मज़ा लेने के लिए इकट्ठा होते हैं। मुंबई, पुणे और ठाणे जैसे शहरों की तरह डोंबिवली में भी इसका जोश देखने को मिलता है।
दिवाली के दिनों में सुबह के सुहाने माहौल में जो संगीत की महफिल सजती है, उसी को दिवाली भोर कहते हैं। इसमें शास्त्रीय संगीत, भावपूर्ण गीत, भक्तिगीत, संतों की वाणी और लोकप्रिय मराठी गाने पेश किए जाते हैं। सुबह की ताज़ा हवा में सुरीला संगीत सुनना लोगों के लिए एक खास मौका होता है। कई जगह मशहूर गायक, स्थानीय कलाकार और संगीत के शौकीन इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं।
डोंबिवली को सांस्कृतिक और कला प्रेमी शहर के रूप में जाना जाता है। यहां के लोग हर त्योहार पूरे उत्साह से मनाते हैं। दिवाली के दौरान शहर की अलग-अलग सांस्कृतिक संस्थाएं, गणेश मंदिर संस्थान, मंडल और सोसायटियां दिवाली भोर के कार्यक्रम करवाती हैं।
कुछ जगहों पर संगीत की महफिलें जमती हैं, तो कुछ जगहों पर ढोल-नगाड़ों की गूंज और पारंपरिक गानों से दिवाली की सुबह में जोश भर जाता है। खासकर फडके रोड पर दिवाली का त्योहारी माहौल डोंबिवली के लोगों के लिए आकर्षण का खास विषय रहता है। पारंपरिक पोशाक में सजे नौजवान, दोस्तों से मुलाकातें और उमंग भरा माहौल डोंबिवली की दिवाली भोर को खास बना देते हैं।
दिवाली भोर के कार्यक्रमों में कई तरह के संगीत को पहली जगह मिलती है। इनमें भक्तिगीत और गणेश स्तुति, संतों की वाणी और भजन, लोकप्रिय मराठी भावपूर्ण गीत, शास्त्रीय और सुगम संगीत तथा मराठी फिल्मों के सदाबहार गाने होते हैं। इस संगीत से दिवाली की सुबह मंत्रमुग्ध हो जाती है।
इन कार्यक्रमों का एक और आकर्षण पारंपरिक पोशाक है। महिलाएं नौ गज की साड़ी, पैठनी या दूसरी पारंपरिक साड़ियों में सजी दिखती हैं, जबकि पुरुष कुर्ता-पायजामा, धोती और साफा पहनते हैं। डोंबिवली जैसे शहर में, जो सांस्कृतिक परंपराओं को संभालकर रखता है, पारंपरिक कपड़ों में नौजवानों और परिवारों की मौजूदगी दिवाली भोर की रौनक बढ़ाती है।
दिवाली भोर सिर्फ संगीत का कार्यक्रम नहीं है, यह अपनों के साथ वक्त बिताने का भी एक सुंदर अनुभव है। बरसों बाद मिलने वाले दोस्त, परिवार के साथ तस्वीरें, साथ पी गई चाय और नाश्ता इस दिन की यादों को खास बना देते हैं। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में ऐसे कार्यक्रमों से लोग कुछ पल अपने लिए और अपने पसंदीदा लोगों के लिए निकाल पाते हैं।
दिवाली भोर भारतीय संस्कृति में संगीत, परंपरा और सामाजिक एकता का सुंदर मेल है। इन कार्यक्रमों से स्थानीय कलाकारों को अपनी कला दिखाने का मंच मिलता है। नई पीढ़ी को मराठी भावपूर्ण गीत, संतों की वाणी और पारंपरिक संगीत से पहचान होती है। डोंबिवली जैसे सांस्कृतिक विरासत संभालने वाले शहरों में ऐसे कार्यक्रमों से त्योहार का उत्साह और बढ़ जाता है। इस तरह दिवाली भोर सिर्फ मनोरंजन का मौका नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का एक जरिया है।


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