चेर्नोबिल के प्रतिबंधित इलाके में छोड़े गए 31 जंगली घोड़े आज सैकड़ों में पहुंचे
1998-99 में चेर्नोबिल के बंद इलाके में छोड़े गए प्रझेवाल्स्की घोड़ों की संख्या कैमरा ट्रैप के मुताबिक 2018 तक कम से कम 137 हो चुकी थी।
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अप्रैल 1986 में तत्कालीन सोवियत रूस के चेर्नोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र में जो भीषण धमाका हुआ, उसे इंसानी इतिहास का सबसे बड़ा और तबाही मचाने वाला न्यूक्लियर हादसा माना जाता है। यह जगह आज के यूक्रेन में आती है। हादसे के बाद निकले जानलेवा रेडिएशन की वजह से हजारों लोगों को एक रात में अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। सैकड़ों मील का इलाका इंसानों के रहने के लिए पूरी तरह बंद, यानी Exclusion Zone, घोषित कर दिया गया।
जहां इंसान का कदम रखना भी मौत को न्योता देने जैसा था, वहीं कुदरत ने ऐसा करिश्मा दिखाया है, जिसकी कल्पना किसी वैज्ञानिक ने नहीं की थी।
करीब 28 साल पहले, यानी 1998 में, चेर्नोबिल के इसी वीरान और रेडिएशन से भरे इलाके में प्रझेवाल्स्की (Przewalski) नस्ल के 31 जंगली घोड़े छोड़े गए थे। यह नस्ल बेहद दुर्लभ है। कई रिसर्चरों का अंदाजा था कि रेडिएशन और खाने की कमी इन घोड़ों की जान ले लेगी। लेकिन तीन दशक बाद कैमरा ट्रैप से मिले नतीजों ने पूरी दुनिया और जीवविज्ञानियों को हैरान कर दिया। ये घोड़े न सिर्फ जिंदा रहे, बल्कि चेर्नोबिल के घने और सूने जंगल में उन्होंने अपनी पूरी बस्ती बसा ली है।
प्रझेवाल्स्की को दुनिया की आखिरी सच्ची जंगली घोड़ा नस्ल माना जाता है। खुले घास के मैदानों और कठिन मौसम में रहने की इनकी ताकत गजब की होती है। बीसवीं सदी के आखिरी दौर में यह नस्ल खत्म होने की कगार पर थी। कुदरत का संतुलन बनाए रखने और इस इलाके में जैविक पुनर्रचना के लिए अस्कानिया-नोवा बायोस्फीयर रिजर्व (Askania-Nova Biosphere Reserve) ने 1998 और 1999 के बीच चेर्नोबिल के प्रतिबंधित क्षेत्र में 31 घोड़े छोड़ने का हिम्मत भरा फैसला लिया।
इन 31 घोड़ों में अस्कानिया-नोवा से लाए गए 10 नर और 18 मादा थे। बाकी 3 घोड़े एक स्थानीय चिड़ियाघर से लाए गए थे। खतरनाक माहौल में सीधे छोड़ने से पहले उन्हें कुछ महीने बाड़े में रखा गया, ताकि वे यहां के मौसम के आदी हो जाएं।
शुरुआती दिन इन घोड़ों के लिए बहुत कठिन रहे। वैज्ञानिक शोधपत्र के मुताबिक यहां आने के कुछ ही महीनों में 8 घोड़ों की मौत हो गई। इसके बाद बचे हुए घोड़ों ने माहौल से तालमेल बिठाया और बच्चे पैदा करने लगे। 2003-2004 तक उनकी संख्या बढ़कर 65 हो गई। संख्या बढ़ती देखकर 2004 में चिड़ियाघर से 13 घोड़े और लाए गए, लेकिन अफसोस कि वे यहां के माहौल में टिक नहीं पाए और एक भी बच्चा छोड़े बिना मर गए।
2007 तक झुंड की संख्या फिर गिरकर 30 से 40 के बीच आ गई। खास बात यह कि इन घोड़ों की मौत की वजह रेडिएशन या भेड़ियों के हमले नहीं थे। इसके पीछे अवैध शिकार करने वाले इंसानी गिरोह यानी Poachers थे। इतनी मुश्किलों के बाद भी घोड़ों की जिद ने यह सिलसिला टूटने नहीं दिया।
सर्गेई गाशचक और सर्गेई पास्केविच नाम के रिसर्चरों ने अपनी स्टडी रिपोर्ट 'थेरिओलोजिया यूक्रेनिका' (Theriologia Ukrainica) नाम की जानी-मानी वैज्ञानिक पत्रिका में छापी। इसके लिए उन्होंने चेर्नोबिल के 2,600 वर्ग किलोमीटर इलाके में से 720 वर्ग किलोमीटर में आधुनिक कैमरा ट्रैप लगाए थे।
कैमरा ट्रैप के डेटा की जांच में सामने आया कि 2018 तक यूक्रेन वाले हिस्से में कम से कम 137 प्रझेवाल्स्की घोड़े पूरी तरह तंदुरुस्त और आजाद जिंदगी जी रहे थे। इनमें 47 बड़े नर, 66 मादा और 24 छोटे बच्चे (Foals) शामिल थे। जिन इलाकों का सर्वे नहीं हुआ, वहां यह संख्या इससे भी ज्यादा होने की पूरी संभावना जताई गई है।
यह प्रयोग एक अहम वैज्ञानिक सच्चाई की तरफ इशारा करता है। इंसानी दखल, प्रदूषण, शहरीकरण और सड़कों का निर्माण बंद होने से कुदरत ने खुद को फिर से संवारना शुरू कर दिया है। वहां रेडिएशन का खतरा अब भी बना हुआ है, फिर भी इंसानों की गैरमौजूदगी से मिला बेखौफ माहौल इन जानवरों के बढ़ने में काम आया है।
रिसर्चरों ने यह भी पाया कि कुछ घोड़े प्रिपयात (Pripyat) नदी पार करके बेलारूस की सीमा में चले गए हैं और वहां उन्होंने नए प्रजनन समूह बना लिए हैं। कुदरत की यह गजब ताकत साबित करती है कि इंसानी तबाही के निशानों पर भी जिंदगी दोबारा खिल सकती है।
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