ताडोबा में बाघ 2010 के 15 से बढ़कर 2025 की गिनती में 89 हुए
चंद्रपुर जिले के ताडोबा-अंधारी टाइगर रिज़र्व में बाघों की संख्या 2010 में 15 थी और 2025 की गिनती में 89 दर्ज हुई।
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महाराष्ट्र का ताडोबा-अंधारी टाइगर रिज़र्व वन्यजीव प्रेमियों के लिए बड़ी जगह बनकर उभरा है। यहां बाघों की गिनती 2010 में 15 थी और 2025 की गिनती में यह 89 दर्ज हुई। यह बढ़ोतरी बताती है कि जंगल और बाघों के रहने की जगह को बचाने का काम लगातार चलता रहे तो इलाके की प्राकृतिक विरासत सुरक्षित रहती है।
चंद्रपुर जिले में बसा ताडोबा बाघों, तरह-तरह के जानवरों और सफारी के अनुभव की वजह से पूरे देश में पहचाना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से सैलानी, वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर और प्रकृति के शौकीन यहां पहुंचते हैं।
पिछले डेढ़ दशक में ताडोबा के बाघों की संख्या में काफी बदलाव आया है। उपलब्ध जानकारी में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक रिज़र्व में 2010 में 15 बाघ दर्ज हुए थे। 2014 में यह संख्या 65 और 2022 में 87 रही। बताया जाता है कि 2024 में गिनती 95 तक पहुंची, जबकि 2025 में यह 89 रही।
2024 और 2025 के आंकड़ों में जो फर्क दिखता है, उसका मतलब यह नहीं कि बाघ सचमुच घट गए हैं। सर्वे का दायरा, बाघों की पहचान के तरीके और गिनती की तकनीक बदलने से अनुमान ऊपर-नीचे हो सकते हैं। पक्का आकलन तभी हो सकता है जब वन विभाग के संबंधित सर्वे के पूरे नतीजे और उनका तरीका सामने हो।
बाघों की आबादी बनाए रखने के लिए जंगल के आवास को बचाना, शिकार को रोकना और पानी के पर्याप्त स्रोत बनाए रखना जरूरी है। इसके साथ बाघ जिन जानवरों का शिकार करते हैं, उनकी तादाद बचाए रखना, इंसानी दखल को सीमित रखना और जंगल के आसपास रहने वाले लोगों को इस काम में जोड़ना भी संरक्षण का हिस्सा है।
बाघ बढ़ने के साथ अधिकारियों के सामने इंसान और वन्यजीव के टकराव, जंगल के टुकड़ों में बंटने और पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने जैसी चुनौतियां भी हैं।
मध्य भारत के बड़े वन्यजीव इलाके में ताडोबा की अहम भूमिका है। जंगल के गलियारे बाघों को एक आवास से दूसरे में जाने देते हैं, उनकी आनुवंशिक विविधता को सहारा देते हैं और आबादी को ठीक जगहों तक फैलने का मौका देते हैं। पेंच, बोर और उमरेड-पौनी से जुड़े जंगलों के बीच कनेक्टिविटी बनाए रखना लंबे समय के संरक्षण के लिए जरूरी है। इन रास्तों को टुकड़ों में बंटने से बचाना और संवेदनशील इलाकों के आसपास विकास को संभालना खास प्राथमिकताएं हैं।
महाराष्ट्र में वन्यजीव पर्यटन के लिए ताडोबा-अंधारी टाइगर रिज़र्व बड़ा आकर्षण बन गया है। सैलानी यहां कुदरती माहौल में बाघ देखने आते हैं। इसके अलावा तेंदुआ, भालू, जंगली कुत्ते, हिरण और कई तरह के पक्षी भी देखने को मिलते हैं।
पर्यटन से स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी भी चलती है। सफारी, गाइड सेवा, ट्रांसपोर्ट, ठहरने की व्यवस्था और सैलानियों से जुड़े दूसरे कारोबार इसी पर टिके हैं। फिर भी पर्यटन की गतिविधियां संरक्षण के नियमों के दायरे में ही रहनी चाहिए, ताकि बढ़ती सैलानियों की भीड़ से जानवरों को परेशानी न हो और जंगल को नुकसान न पहुंचे।
2010 के 15 बाघ से 2025 के 89 तक का सफर ताडोबा में लंबे समय से चल रहे संरक्षण के काम की अहमियत दिखाता है। लेकिन आबादी को बचाए रखने के लिए सिर्फ संख्या बढ़ाना काफी नहीं है। सुरक्षित आवास, पर्याप्त शिकार, आपस में जुड़े जंगल के गलियारे और इंसान-वन्यजीव टकराव घटाने के असरदार उपाय भी उतने ही जरूरी हैं।
नागपुर और पूरे विदर्भ के लिए ताडोबा एक अहम प्राकृतिक पूंजी है, जहां जैव विविधता का संरक्षण, पर्यटन और स्थानीय कमाई के मौके एक साथ चलते हैं। महाराष्ट्र के अग्रणी वन्यजीव ठिकानों में इसकी साख बनाए रखने के लिए आवास की लगातार हिफाजत और जिम्मेदार पर्यटन जरूरी रहेगा।