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बेटा-बेटी बालिग हों, फिर भी पिता को देना होगा गुजारा भत्ता: हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने कामठी के एक पिता की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि बच्चों के बालिग होने से पिता की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।

बेटा-बेटी बालिग हों, फिर भी पिता को देना होगा गुजारा भत्ता: हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

बच्चे बालिग हो गए, सिर्फ इस वजह से कोई पिता अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने बच्चों की पढ़ाई और भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में यही बात साफ कर दी है। अदालत ने कहा कि बेटा 18 साल का हो गया हो, लेकिन उसकी पढ़ाई पूरी नहीं हुई हो, तो उसकी पढ़ाई का पूरा खर्च अकेली मां पर नहीं डाला जा सकता।

यह फैसला खंडपीठ के न्यायमूर्ति मेहरोज खान पठाण ने सुनाया। मामला कामठी में रहने वाले एक पिता का था। उन्होंने फैमिली कोर्ट के गुजारा भत्ते वाले आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति पठाण ने उनकी याचिका खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट का आदेश जैसा था वैसा ही बरकरार रखा।

पिता ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि उनका बेटा और बेटी, दोनों अब बालिग हैं। उनका कहना था कि इसलिए उन्हें गुजारा भत्ता देते रहने की जिम्मेदारी अब नहीं बनती। हाईकोर्ट ने यह दलील नहीं मानी। अदालत ने संबंधित कानूनी प्रावधानों को देखकर ही याचिका खारिज की।

सुनवाई में भरण-पोषण से जुड़े कानून अहम रहे। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत आम तौर पर बालिग संतान गुजारा भत्ते की हकदार नहीं होती। लेकिन अगर कोई संतान शारीरिक या मानसिक असामान्यता या चोट की वजह से अपना खर्च खुद नहीं उठा सकती, तो उसके लिए कानून में अलग से प्रावधान है।

दूसरी तरफ हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम की धारा 20(3) है। इसके मुताबिक अगर अविवाहित बेटी अपना खर्च खुद नहीं चला सकती, तो वह तय कानूनी शर्तों के तहत पिता से भरण-पोषण मांग सकती है। यानी अविवाहित बेटी को भी यह हक कानून से मिला हुआ है।

इस मामले में फैमिली कोर्ट ने 7 दिसंबर 2019 को दोनों बच्चों के लिए हर महीने 7-7 हजार रुपये का गुजारा भत्ता मंजूर किया था। पिता ने इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, मगर वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिली और यह रकम तय रही।

मामले में पिता जिला परिषद के स्कूल में शिक्षक हैं, जबकि मां नगर परिषद के स्कूल में शिक्षिका हैं।

इस फैसले की खास बात यह है कि इसमें बच्चों की उम्र और उनकी पढ़ाई की हालत को अलग-अलग देखने की जरूरत बताई गई है। सिर्फ बालिग हो जाने के आधार पर पिता अपनी सारी जिम्मेदारियों से इनकार नहीं कर सकता। अदालत के फैसले से संदेश यही निकलता है कि बच्चों की पढ़ाई और भरण-पोषण को लेकर होने वाले विवादों में लागू कानूनी प्रावधानों और उस मामले की परिस्थितियों को देखकर ही फैसला होगा।

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