नागपुर यूनिवर्सिटी में जांच के लिए बनी करीब दर्जन भर कमेटियां अब तक फाइलों में अटकीं
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय में अलग-अलग मांगों और शिकायतों की जांच के लिए बनीं कमेटियों का काम आगे नहीं बढ़ा है, इससे प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय का कामकाज हमेशा से चर्चा में रहा है। अब नया सवाल यह उठा है कि अलग-अलग मांगों और मामलों की जांच और अध्ययन के लिए जो करीब दर्जन भर से ज्यादा समितियां बनाई गईं, वे आज भी फाइलों में बंद पड़ी हैं। किसी कमेटी की बैठक ही नहीं हुई, तो किसी का एजेंडा तक तय नहीं हो पाया। नतीजा यह है कि असली हालात सामने नहीं आ रहे और प्रशासन की विश्वसनीयता पर भी उंगलियां उठ रही हैं।
विश्वविद्यालय में 39 पीजी विभाग हैं और 3 कॉलेज वह खुद चलाता है। प्रशासन ने इन सबको ऑटोनॉमस बना दिया है। विभागों की स्थिति, प्राध्यापकों की कमी, छात्रों की कमी और छात्र संख्या बढ़ाने के उपायों पर गौर करने के लिए पिछले साल सीनेट की बैठक में एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई गई थी। लेकिन अब तक इस कमेटी का काम आगे नहीं बढ़ सका है।
इसका असर साफ दिखता है। कई विभागों में प्रवेश क्षमता के मुकाबले आधे दाखिले भी नहीं हो पाए हैं। इधर विश्वविद्यालय के कई मामले अदालत में लंबित हैं और समय-समय पर छात्र भी याचिका दाखिल करते रहते हैं। इन लंबित मामलों की मौजूदा हालत देखने और उन्हें निपटाने के लिए भी एक कमेटी बनी थी। इसी तरह अधिकारियों की कमी से जो कामकाज प्रभावित हो रहा है, उसकी समीक्षा के लिए भी कमेटी गठित की गई थी।
आर्थिक गड़बड़ी के मामले में भी यही हाल है। तत्कालीन स्पोर्ट्स डायरेक्टर शरद सूर्यवंशी की कथित आर्थिक अनियमितता की जांच के लिए एक नहीं, दो कमेटियां बनाई गई थीं। फिर भी सच्चाई अब तक बाहर नहीं आई और इस बीच सूर्यवंशी सेवानिवृत्त भी हो गए। ऑनलाइन परीक्षा का काम देखने वाली कोएम्प्ट कंपनी को लेकर भी कमेटी बने साल भर से ज्यादा हो चुका है, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। कमेटियां तो पूरे जोश के साथ बना दी जाती हैं, पर लगभग सभी फाइलों में ही दबी रह जाती हैं।
मामले अटकने की मुख्य वजहें गिनाई गई हैं। पहली वजह इच्छाशक्ति की कमी है। कई बार विश्वविद्यालय प्रशासन या संबंधित अधिकारी संवेदनशील मामलों की जांच में दिलचस्पी नहीं लेते या टालमटोल की नीति अपनाते हैं। दूसरी वजह तालमेल की कमी है। अलग-अलग विभागों या कमेटियों के सदस्यों में आपसी समन्वय न होने से बैठकों का एजेंडा ही तय नहीं हो पाता।
तीसरी वजह दबाव की राजनीति है। कई मामलों में राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के चलते फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं, ताकि किसी की जवाबदेही तय न करनी पड़े। चौथी वजह यह है कि जांच समितियों के पास कर्मचारी और संसाधन कम हैं, और प्रशासनिक अमले की कमी भी फाइलों के अटकने का कारण बनती है।
इसके दुष्परिणाम भी गिनाए गए हैं। वित्तीय गड़बड़ियों, शैक्षणिक भ्रष्टाचार या दूसरे विवादों की जांच के लिए ये कमेटियां बनती हैं, लेकिन वक्त पर इंसाफ न मिलने से पीड़ितों का भरोसा टूट जाता है। कार्रवाई न होने से गड़बड़ी करने वालों को एक तरह से चुपचाप संरक्षण मिल जाता है और उनके हौसले बढ़ते हैं। पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं और विश्वविद्यालय की साख व पढ़ाई के माहौल पर बुरा असर पड़ता है।
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