आजादी से पहले के कागज सबसे अहम, हाईकोर्ट ने हल्बी दावा माना, जाति वैधता जारी करने का आदेश
मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने भाई-बहन के हल्बी अनुसूचित जनजाति दावे को सही ठहराया।
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मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि आजादी से पहले के पुराने राजस्व और जन्म-मृत्यु रिकॉर्ड में अगर जाति 'हल्बी' लिखी है, तो उन कागजों की कानूनी कीमत सबसे ऊपर होती है। बाद के दौर में आई कुछ संदिग्ध या आपस में न मिलने वाली एंट्रियों के सहारे आदिवासी वर्ग का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फालके और न्यायमूर्ति राज डी. वाकोडे ने दिया। इससे याचिकाकर्ता भाई-बहन को बड़ी राहत मिली है।
याचिकाकर्ताओं के नाम प्रकाश प्रभाकर पराते और प्रगती प्रभाकर पराते हैं। प्रकाश राशनिंग इंस्पेक्टर हैं और प्रगती शिक्षिका हैं। अमरावती की अनुसूचित जनजाति जाति प्रमाणपत्र सत्यापन समिति ने 29 जुलाई 2017 को आदेश निकालकर उनका 'हल्बी' (अनुसूचित जनजाति) होने का दावा खारिज कर दिया था। इसी आदेश के खिलाफ उन्होंने नागपुर खंडपीठ में याचिका लगाई थी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर यह मामला दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट के सामने आया था। कोर्ट ने साफ किया कि 1950 से पहले, यानी आजादी से पहले के कागजों का कानून के हिसाब से ऊंचा सबूत-मूल्य होता है। जब ये कागज असली और भरोसेमंद साबित हो जाएं, तो बाद की कुछ बेमेल एंट्रियों के आधार पर असली दावा नहीं ठुकराया जा सकता। दक्षता दल ने जिन 'कोष्टी' एंट्रियों का हवाला दिया था, उनका याचिकाकर्ताओं की वंशावली से कोई सीधा संबंध या सबूत समिति नहीं जोड़ पाई।
याचिकाकर्ताओं की तरफ से एड. आर. एस. परसोडकर ने दलील दी कि उनके मुवक्किलों के पास 1912 से आजादी से पहले के बहुत पुराने कागज मौजूद हैं। परदादा 'राधो' और दादा 'वासुदेव' के जन्म रिकॉर्ड हैं। इसके अलावा 1912, 1927, 1931 और 1937 के राजस्व और नगरपालिका कर आकलन के दस्तावेजों में भी उनकी जाति साफ तौर पर 'हल्बी' दर्ज है।
हाईकोर्ट ने अमरावती की जाति सत्यापन समिति का 29 जुलाई 2017 का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने घोषित किया कि प्रकाश पराते और प्रगती पराते 'हल्बी' अनुसूचित जनजाति के हैं। समिति को सख्त निर्देश दिया गया है कि फैसला मिलने के छह हफ्ते के अंदर याचिकाकर्ताओं को जाति वैधता प्रमाणपत्र जारी करे। सरकार की तरफ से एड. एस. वी. नारले ने पक्ष रखा।
जजों ने गजेटियर और आर. वी. रसेल की किताब जैसे ऐतिहासिक हवालों का जिक्र करते हुए कहा कि पुराने जमाने में हल्बी समाज के कुछ लोग बुनाई का काम अपना लेते थे। इसलिए कुछ जगहों पर उन्हें 'कोष्टी' भी कहा गया हो, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि 'एफिनिटी टेस्ट' सिर्फ दूसरे दर्जे का पैमाना होता है।
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