ASCI की जांच: न्यूट्रास्युटिकल के 60 विज्ञापनों में नियमों का उल्लंघन
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में वजन घटाने, एंटी-एजिंग और बीमारियों से राहत के दावों पर सवाल उठे हैं।
एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) ने न्यूट्रास्युटिकल विज्ञापनों पर अपनी नई रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट का नाम है 'अ पिल फॉर थॉट: रिव्यू ऑफ हेल्थ एंड वेलनेस क्लेम्स इन न्यूट्रास्युटिकल एडवर्टाइजिंग'। यह रिपोर्ट जुलाई से सितंबर 2026 के बीच इन विज्ञापनों की सुओ-मोटो यानी खुद शुरू की गई जांच पर आधारित है। इसमें ऐसे दावे और प्रस्तुति सामने आई हैं, जो तय अवधि के नतीजों के जरिए ग्राहकों को गुमराह कर सकती हैं। साथ ही सेहत और वेलनेस से जुड़े दावों के सबूत को लेकर बार-बार उभरने वाली दिक्कतें भी रिपोर्ट में गिनाई गई हैं।
ग्रैंड व्यू रिसर्च के मुताबिक भारत का न्यूट्रास्युटिकल बाजार 2025 में 38.77 अरब अमेरिकी डॉलर का था। सेहत को लेकर बढ़ती जागरूकता और बीमारी से बचाव वाली देखभाल की मांग के चलते इसके 2033 तक 1,151.5 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। फंक्शनल फूड्स, पेय और डाइटरी सप्लिमेंट्स में यह श्रेणी फैल रही है, और इसी के साथ उत्पाद के असर को लेकर ग्राहकों की सोच बनाने में विज्ञापनों की भूमिका भी बढ़ती दिख रही है।
जांचे गए 61 विज्ञापनों में से एक मामले पर अभी कार्रवाई चल रही है। जिन 60 विज्ञापनों की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वे सभी ASCI की संहिता का उल्लंघन करते पाए गए। इनमें से 29 विज्ञापनों पर संबंधित विज्ञापनदाताओं ने कोई आपत्ति नहीं जताई। बाकी 31 विज्ञापनदाताओं ने आपत्तियों को चुनौती दी, लेकिन वे अपने विज्ञापनों के दावों के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सके।
नियमों का उल्लंघन खासतौर से वजन पर नियंत्रण, एंटी-एजिंग, त्वचा निखारने, यूवी से बचाव और सांस की सेहत से जुड़े दावों में मिला। रिपोर्ट में दमा, सीओपीडी, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और पीसीओएस जैसी बीमारियों पर काबू पाने का दावा करने वाले विज्ञापनों की खामियां भी दर्ज हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए नतीजे और भ्रामक दृश्य ग्राहकों में गैर-वाजिब उम्मीदें जगा सकते हैं, और आम वेलनेस सपोर्ट तथा मेडिकल इलाज के बीच का फर्क भी धुंधला कर सकते हैं।
ऐसे दावों के उदाहरणों में "60 दिन में 6 किलो वजन घटाएं", "12 हफ्तों में जांघ की चर्बी गायब हो जाएगी" और "यूवी नुकसान के खिलाफ त्वचा को 300 प्रतिशत ज्यादा मजबूत सुरक्षा" शामिल थे। कई बार तैयार उत्पाद वाकई वैसा नतीजा देता है, इसका कोई ठोस सबूत नहीं था, फिर भी पूरे उत्पाद के दावे को सही ठहराने के लिए सिर्फ उसके घटकों से जुड़े सबूत इस्तेमाल किए गए। उत्पाद से जुड़ी ठोस पुष्टि के बिना 'पहले और बाद' की तुलना दिखाकर तेज और नजर आने वाले नतीजों के दावों को उभारने के लिए विज़ुअल्स का भी जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल हुआ।
जांचे गए मामलों में तीन मुख्य तरीके सामने आए। पहला, पर्याप्त सबूत के बिना दावे: विज्ञापनदाता यह साबित करने वाले काफी क्लिनिकल सबूत या स्वतंत्र टेस्ट रिपोर्ट पेश नहीं कर पाए कि तैयार उत्पाद विज्ञापित फायदे सचमुच देता है। दूसरा, तुलना का आधार बताए बिना श्रेष्ठता का दावा: "ज्यादा तेज" और "ज्यादा असरदार" जैसे शब्दों से तुलनात्मक श्रेष्ठता जताई गई, पर इस तुलना का आधार हमेशा साफ या साबित नहीं था। तीसरा, सबूत से पहले वादे: अकसर ठीक पुष्टि के बिना फायदों के दावे किए गए, और ASCI के आपत्ति उठाने के बाद विज्ञापनदाताओं ने सबूत देने की जगह खुद अपने विज्ञापन वापस लेना या उनमें बदलाव करना चुना।
ASCI की सीईओ और सेक्रेटरी जनरल मनीषा कपूर ने कहा, "ग्राहक बड़े भरोसे के साथ न्यूट्रास्युटिकल्स की ओर जाते हैं, और अकसर मकसद अपनी सेहत और तंदुरुस्ती पर सीधा असर डालने वाली समस्याओं का हल ढूंढना होता है। जब विज्ञापन तेजी से वजन घटाने, बढ़ती उम्र को रोकने या खास बीमारियों से राहत दिलाने का वादा करते हैं, तब उन दावों का समर्थन करने वाले सबूत भी उतने ही मजबूत होने चाहिए। किसी घटक पर हुई रिसर्च को अपने आप अंतिम उत्पाद का असर साबित करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जैसे-जैसे यह श्रेणी फैल रही है, विज्ञापनों के दावों और उपलब्ध सबूतों के बीच तालमेल होना जरूरी है, ताकि ग्राहक सोच-समझकर फैसला ले सकें और सबूतों से परे किए गए गैर-वाजिब वादों से उनका भरोसा खतरे में न पड़े।"
इस समीक्षा के जरिए ASCI ने जिम्मेदार हेल्थ और वेलनेस विज्ञापनों की अहमियत फिर रेखांकित की है। उसके मुताबिक दावे भरोसेमंद सबूतों पर टिके होने चाहिए, और शब्दों, दृश्यों तथा वादा किए गए नतीजों से बनने वाला कुल असर भ्रामक नहीं होना चाहिए। ASCI का कहना है कि विज्ञापनदाताओं के लिए दावों की ठोस पुष्टि सिर्फ कानूनी औपचारिकता नहीं है, बल्कि ग्राहकों की सुरक्षा और न्यूट्रास्युटिकल श्रेणी पर भरोसा बनाए रखने की बुनियादी जरूरत है।
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