मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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18:21 IST

व्यापारियों को यूपीआई पर मुफ्त पेमेंट का भरोसा दिया गया था, अब एमडीआर लगने से एसएचसीवी नाराज

स्टील एंड हार्डवेयर चैंबर ऑफ विदर्भ ने केंद्रीय वित्त मंत्री को यूपीआई एमडीआर वापस लेने की मांग वाला ज्ञापन भेजा है।

व्यापारियों को यूपीआई पर मुफ्त पेमेंट का भरोसा दिया गया था, अब एमडीआर लगने से एसएचसीवी नाराज
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

स्टील एंड हार्डवेयर चैंबर ऑफ विदर्भ (एसएचसीवी) ने केंद्रीय वित्त मंत्री को एक ज्ञापन सौंपा है जिसमें 2,000 रुपये से ऊपर के यूपीआई पर्सन-टू-मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर लगने वाले 0.40 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को वापस लेने की मांग की गई है। यह चार्ज जीएसटी अलग से और अधिकतम 300 रुपये तक सीमित होगा। यह एमडीआर एनपीसीआई के 15.09.2026 के सर्कुलर नंबर 237/2026-27 के जरिए लाया गया है और 15.10.2026 से लागू होगा। इस ज्ञापन की एक प्रति हस्तक्षेप के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय को भी भेजी गई है।

चैंबर का कहना है कि आरबीआई के पेमेंट सिस्टम विजन डॉक्युमेंट्स में लगातार लागत घटाना ही मुख्य मकसद बताया गया है। व्यापार जगत और आम जनता को यूपीआई को एक फ्री, रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम बताकर प्रमोट किया गया था। चैंबर के मुताबिक अब एमडीआर लगाना उसी वजह को उलट देता है जिसके आधार पर व्यापारियों को कैश और कार्ड छोड़कर यूपीआई अपनाने के लिए प्रेरित किया गया था।

ज्ञापन में बताया गया है कि यूपीआई अपनाने के लिए खुद सरकार ने ही जोर दिया है, कई मामलों में तो इसे अनिवार्य ही बना दिया गया। इनकम टैक्स एक्ट की धारा 269एसयू के तहत 50 करोड़ रुपये से ज्यादा टर्नओवर वाले बिजनेस के लिए यूपीआई स्वीकार करना अनिवार्य है। सीजीएसटी नियमों के तहत बड़े बिजनेस को इनवॉइस पर डायनामिक क्यूआर कोड दिखाना पड़ता है, और सेबी ने आईपीओ आवेदनों के लिए यूपीआई अनिवार्य कर रखा है। चैंबर के सदस्यों ने यह भी पाया कि पोस्ट ऑफिस स्पीड पोस्ट बुकिंग के लिए कैश लेने से मना कर यूपीआई पर जोर दे रहे हैं। चूंकि यह बदलाव इस भरोसे पर कराया गया था कि यूपीआई सस्ता ही बना रहेगा, इसलिए चैंबर का कहना है कि अब नई लागत थोपना गलत है। एसएचसीवी यह मानती है कि पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट की धारा 10ए, जो तय डिजिटल पेमेंट मोड पर चार्ज लगाने से रोकती है, टेक्स्ट के हिसाब से सिर्फ धारा 269एसयू के दायरे में आने वाले बिजनेस पर ही लागू होती है। चैंबर का कहना है कि यह प्रावधान डिजिटल पेमेंट की लागत का रोड़ा हटाने के लिए बनाए गए एक बड़े कानूनी पैकेज का हिस्सा था। इसी भावना के तहत जीरो-एमडीआर को व्यवहार में हर साइज के व्यापारी पर लागू किया गया। छोटे और मझोले व्यापारियों ने इसी उम्मीद पर अपना पेमेंट सिस्टम बदला था कि यह आगे भी जारी रहेगा।

चार्ज के ढांचे पर चैंबर का कहना है कि 300 रुपये की सीमा अलग-अलग साइज के व्यापार पर असमान असर डालती है। चूंकि एमडीआर प्रति ट्रांजैक्शन 300 रुपये पर कैप्ड है, इसलिए 75,000 रुपये ब्रेक-ईवन पॉइंट बनता है (75,000 रुपये का 0.40 प्रतिशत यानी 300 रुपये)। लगभग 2,000 से 75,000 रुपये के बीच ट्रांजैक्शन करने वाले व्यापारियों को हर ट्रांजैक्शन पर पूरा, बिना कैप वाला 0.40 प्रतिशत (साथ में लागू जीएसटी) चुकाना पड़ता है। ये आमतौर पर छोटे और मझोले व्यापारी होते हैं, जिनमें चैंबर के अपने काफी सदस्य भी शामिल हैं। 75,000 रुपये से ऊपर, ट्रांजैक्शन वैल्यू के हिसाब से असरदार दर धीरे-धीरे घटती जाती है, क्योंकि चार्ज ट्रांजैक्शन के साइज से बेपरवाह 300 रुपये पर ही कैप्ड रहता है। इस तरह यह ढांचा बड़े व्यापार के मुकाबले मझोले व्यापार पर कहीं ज्यादा बोझ डालता है।

अध्यक्ष संजय के. अग्रवाल ने कहा: "गजट नोटिफिकेशन 14 सितंबर की तारीख का है। स्टीयरिंग कमेटी की बैठक 15 सितंबर को हुई और उसी में प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई, और उसी दिन एनपीसीआई का सर्कुलर भी जारी हो गया। एक ऐसा फैसला जो 2016 के बाद पहली बार पूरे व्यापारी समुदाय के लिए यूपीआई के मुफ्त होने के स्वरूप को खत्म कर देता है, वह गजट नोटिफिकेशन के एक दिन के भीतर ही निपटा दिया गया। यह पूछना वाजिब है कि क्या कमेटी को सोच-विचार का समय दिया गया या उसे पहले से तय किया हुआ फैसला थमा दिया गया। इतने बड़े असर वाले फैसले के लिए ज्यादा लंबी और सबकी राय लेने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए थी, और हम इस तरह के एकतरफा फैसलों पर अपना कड़ा विरोध दर्ज करते हैं।"

सचिव मुकुल पी. अग्रवाल ने कहा: "हमारी मांग है कि एमडीआर को पूरी तरह वापस लिया जाए और जीरो-एमडीआर फिर से लागू हो, और आरबीआई तथा सदस्य बैंक यूपीआई को चलाने और अपग्रेड करने का खर्च उस भारी बचत से उठाएं जो उन्हें कैश हैंडलिंग और करेंसी मैनेजमेंट में पहले से ही मिल रही है। इसके विकल्प के तौर पर हमने मांग की है कि 15 अक्टूबर 2026 से अगले दस साल तक एमडीआर की दर और शर्तों में कोई बदलाव न किया जाए। सर्कुलर में सिर्फ इतना कहा गया है कि एमडीआर की 'समय-समय पर' समीक्षा होगी, इसलिए भविष्य में कोई भी समीक्षा होने से पहले व्यापार और उपभोक्ता संगठनों से सच्ची और समय-सीमा तय करके सलाह-मशविरा किया जाना चाहिए।"

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