मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

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उल्हास पवार बोले, प्रतापराव भोसले का जीवन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा, 'आधारवड' ग्रंथ का विमोचन

वाई में जनता शिक्षण संस्था और महाराष्ट्र प्रदेश काँग्रेस कमिटी के पूर्व अध्यक्ष स्व. प्रतापराव भोसले पर बने गौरवग्रंथ 'आधारवड' के पहले खंड का विमोचन हुआ।

उल्हास पवार बोले, प्रतापराव भोसले का जीवन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा, 'आधारवड' ग्रंथ का विमोचन तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

वाई में हुए एक कार्यक्रम में स्व. प्रतापराव भोसले के जीवन और काम पर तैयार गौरवग्रंथ 'आधारवड' के पहले खंड का विमोचन हुआ। विधानपरिषद के पूर्व विधायक उल्हास पवार ने कहा कि तत्त्वों पर टिके रहना, पार्टी के प्रति वफादारी, दोस्ती निभाना और दिए हुए वचन पर कायम रहना भोसले की पहचान थी। पवार के मुताबिक यह ग्रंथ मूल्यों पर चलने वाली राजनीति की विरासत बताने वाला दस्तावेज है और नई पीढ़ी को जरूर प्रेरणा देगा।

प्रतापराव भोसले जनता शिक्षण संस्था और महाराष्ट्र प्रदेश काँग्रेस कमिटी के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद थे। ग्रंथ के पहले खंड का विमोचन उल्हासदादा पवार के हाथों हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार और लेखक विजय कुवळेकर ने की। जनता शिक्षण संस्था के अध्यक्ष और पूर्व विधायक मदन भोसले, संस्था के सचिव डॉ. जयवंत चौधरी, प्रा. नारायण चौधरी और प्राचार्य डॉ. गुरुनाथ फगरे खास तौर पर मौजूद थे।

उल्हास पवार ने कहा कि भोसले का व्यक्तित्व कई पहलुओं वाला था। उनकी औपचारिक पढ़ाई कम थी, फिर भी उनकी समझ इतनी तेज थी कि माहिर वकील को भी शर्मिंदा कर दे। दोस्ती कैसे निभाई जाए, वचन कैसे पाला जाए और पार्टी से वफादारी कैसे रखी जाए, इसकी मिसाल उन्होंने अपने बर्ताव से दी। संसद में रहे हों या सार्वजनिक जीवन में, उन्होंने अपने तत्त्वों से कभी समझौता नहीं किया। पवार ने कहा कि उनके जीवन के मूल्य और काम करने का तरीका आज भी रास्ता दिखाते हैं। उन्हें भरोसा है कि 'आधारवड' भाऊ के काम की पहुंच दिखाएगा, आगे की पीढ़ी को उनके विचारों और कर्तृत्व से मिलवाएगा और पाठकों को नई प्रेरणा देगा।

अध्यक्षीय भाषण में विजय कुवळेकर ने कहा कि प्रतापराव भोसले की राजनीति का दौर अलग था। उस वक्त राजनीतिक विरोध होता भी था तो ज्यादातर वह सैद्धांतिक होता था। आज राजनीति और समाजकार्य के रंग बदल गए हैं और लोगों के रूप भी बदल गए हैं। ऐसे में भाऊ जैसे पारदर्शी व्यक्तित्व की अहमियत और ज्यादा महसूस होती है। कुवळेकर के मुताबिक 'तत्त्व' और 'तत्त्वनिष्ठा' जैसे शब्द जब कम सुनाई देने लगे हैं, ऐसे वक्त में भाऊ के जीवन पर गौरवग्रंथ आना वक्त की जरूरत है।

कुवळेकर ने कहा कि ऊंची पढ़ाई डिग्री देती है, लेकिन संस्कार दे ही, यह जरूरी नहीं। भाऊ का नाता खेती और मिट्टी से जुड़ा था। जो साफ होता है, वह खरा भी होता है, पर जहां जरूरत हो वहां संवेदनशीलता भी रखता है। खरापन और संवेदनशीलता का सुंदर मेल भाऊ में था। अपने काम का श्रेय लेने के लिए भागदौड़ करना उनका स्वभाव नहीं था। जिंदगी को वे सकारात्मक और खुशनुमा नजर से देखते थे। मुश्किलों से भागने के बजाय उनका सामना करना उनकी आदत थी। कुवळेकर ने कहा कि आज के राजनीतिक हालात ऐसे ही रहे तो आगे की पीढ़ी को यह सवाल उठ सकता है कि भाऊ जैसा कोई इंसान सचमुच हुआ भी था या नहीं।

कुवळेकर ने कहा कि भाऊ पूर्णता के कई पहलू एक साथ दिखाने वाले व्यक्तित्व थे। 'आधारवड' सिर्फ यादों का संग्रह नहीं, मूल्यनिष्ठा का नतीजा है। यह ग्रंथ तत्त्वों, विचारों और तेज के बीज बोने वाला है। उन्होंने सुझाव दिया कि इसे राज्य की सभी लाइब्रेरियों और यूनिवर्सिटियों तक पहुंचाया जाए।

जनता शिक्षण संस्था के अध्यक्ष मदन भोसले ने कहा कि भाऊ के व्यक्तित्व को शब्दों में बांधना मुश्किल है, वे समझ से परे थे। उनके मन में यशवंतराव चव्हाण साहब और किसन वीर आबा के लिए हमेशा कृतज्ञता का भाव रहा। हाथ में लिया काम डटकर और लगन से पूरा करना उनका स्वभाव था। मदन भोसले ने कहा कि उनके जीवन के काम का दस्तावेज तैयार करने में संपादकों ने जो मेहनत की, वह तारीफ के लायक है। गौरवग्रंथ के कार्यकारी संपादक प्रा. डॉ. शिवाजी कांबळे ने संपादक की ओर से अपनी बात रखी।

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