सूखे की मार: चारा-पानी खत्म, निसर्गसृष्टी गोपालन संस्था में गायें छोड़ रहे किसान
अहिल्यानगर के ईसळक में किसान रोते हुए अपने मवेशी गोपालन संस्था के हवाले कर रहे हैं।
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सूखे के डर ने गांव-देहात के किसान को पूरी तरह तोड़ दिया है। छावणी में हो या अपने ही खूंटे पर, जानवरों को पिलाने के लिए पानी और खिलाने के लिए चारा नहीं बचा। इसी वजह से लाचार किसान अब गोपालन संस्थाओं का सहारा ले रहे हैं। यह खबर अहिल्यानगर से पोपट पिटेकर ने दी है।
ईसळक की निसर्गसृष्टी गोपालन संस्था में अभी 600 से ज्यादा जानवर हैं। सूखा आधिकारिक तौर पर घोषित होने से पहले ही वहां 60 से 70 गोवंश नए छोड़ दिए गए हैं। इतना ही नहीं, 300 से 400 किसान संस्था के संपर्क में हैं। वे हाथ जोड़कर कह रहे हैं कि हमसे इन्हें संभाला नहीं जाता, आप ही हमारे जानवरों को बचा लीजिए। रोते हुए वे अपने जानवर संस्था को सौंप रहे हैं।
किसानों की इस हालत को देखते हुए आने वाले दिनों में संस्था के गोवंश की गिनती 1,000 के पार जाने की आशंका है। एक तरफ जानवर तेजी से बढ़ रहे हैं, दूसरी तरफ पानी और चारे की कमी है। ऐसे में इतने बड़े गोवंश को कैसे संभालें, यह गंभीर और मुश्किल सवाल संस्था के सामने खड़ा है।
पानी का संकट भी गहराने वाला है। गांव में अभी जो पानी खरीदकर मिलता है, वह सिर्फ दो-तीन महीने में खत्म होने की कगार पर है। आगे चलकर नगर शहर से पानी के टैंकर मंगाने पड़ सकते हैं, यही चिंता है। आज 1,000 रुपये में मिलने वाला टैंकर कल 2,000 रुपये तक में खरीदना पड़ेगा।
चारे की कमी पूरी करने के लिए संस्था ने पंजाब और मध्य प्रदेश से गेहूं का भूसा मंगाने की तैयारी की है। अभी रोज का खर्च 10 से 12 लाख रुपये आ रहा है। जानवर बढ़ने पर यह खर्च दोगुना होने का अंदाजा है।
संस्था का कहना है कि हिंदुत्ववादी नेताओं का मार्गदर्शन और सहयोग मिल रहा है, लेकिन उनकी मदद की भी हद है। इसलिए सिर्फ राजनीतिक नेताओं के भरोसे न रहकर आम जनता इस मुश्किल वक्त में आगे आए, ऐसी अपील संस्था ने की है।
संस्था के संस्थापक गौतम कराळे ने भावुक अपील करते हुए कहा कि इंसान के खाने-पीने का इंतजाम किसी तरह हो जाता है, लेकिन इन बेजुबान जानवरों की अनदेखी हुई तो वे जी नहीं पाएंगे। उनके मुताबिक अगर हम गोमाता की रक्षा करेंगे तो गोमाता हमारी रक्षा करेगी। उन्होंने कहा कि इस कठिन घड़ी में लोग खुले हाथ से मदद करें।