सोम‌वार, 19 अक्टूबर 2026

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23:24 IST

घुग्घूस और नकोडा में सद्दुला बतुकम्मा की धूम, तेलंगाना की लोकसंस्कृति बचाने की चुनौती

चंद्रपुर जिले के घुग्घूस शहर और नकोडा गांव में तेलुगू भाषी समाज ने सद्दुला बतुकम्मा पर्व उत्साह से मनाया।

घुग्घूस और नकोडा में सद्दुला बतुकम्मा की धूम, तेलंगाना की लोकसंस्कृति बचाने की चुनौती तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

चंद्रपुर जिले के घुग्घूस शहर और नकोडा गांव में सद्दुला बतुकम्मा पर्व इस साल भी बड़े उत्साह से मनाया गया। यह पर्व तेलुगू भाषी समाज की समृद्ध लोकसंस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों का प्रतीक है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के साथ-साथ महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, ओडिशा और दूसरे इलाकों में भी इसे पारंपरिक खुशी के साथ मनाया गया। घुग्घूस और नकोडा में कई जगहों पर महिलाएं और समाज के लोग पारंपरिक तरीके से बतुकम्मा में शामिल हुए और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से रिश्ता बनाए रखने की कोशिश की।

सद्दुला बतुकम्मा सिर्फ धार्मिक या पारंपरिक समारोह नहीं है। यह प्रकृति, फूल, महिला सशक्तीकरण, पारिवारिक एकता और सामुदायिक भागीदारी से जुड़ा एक अहम लोकउत्सव है। इसके जरिए तेलुगू भाषी समाज अपनी परंपराएं, लोकगीत और सांस्कृतिक पहचान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश करता है।

इस पर्व की खास पहचान अलग-अलग मौसमी फूलों से बनी आकर्षक सजावट है। महिलाएं पारंपरिक तरीके से फूल सजाकर बतुकम्मा तैयार करती हैं, फिर सब मिलकर लोकगीत गाते हुए उत्सव में शामिल होती हैं। आखिर में सामूहिक पूजा होती है और परंपरा के मुताबिक जलविसर्जन किया जाता है।

तेलंगाना में बतुकम्मा का खास सांस्कृतिक महत्व है। समय के साथ तेलंगाना के बाहर रहने वाले तेलुगू भाषी परिवारों के लिए भी यह उत्सव मातृभाषा, परंपरा और सामाजिक एकजुटता को बचाए रखने का अहम जरिया बन गया है। घुग्घूस और नकोडा के आयोजनों ने भी स्थानीय स्तर पर इस सांस्कृतिक विरासत की मौजूदगी को सामने रखा। ऐसे आयोजनों से अलग-अलग समाजों के लोगों को एक साथ आने और अपनी परंपराएं एक-दूसरे से बांटने का मौका मिलता है।

सद्दुला बतुकम्मा पर्व के मौके पर कुछ जगहों के कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का स्वागत और सत्कार किया गया। उनके सामाजिक योगदान और जनहित में किए गए काम की सराहना की गई। ऐसे कार्यक्रमों में सांस्कृतिक उत्सव के साथ सामाजिक संवाद और आपसी सहयोग को भी अहमियत मिलती है। जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों के शामिल होने से इन आयोजनों को सामुदायिक रूप मिलता है।

फिर भी किसी सांस्कृतिक पर्व की कामयाबी सिर्फ मंच के कार्यक्रम, मेहमानों के सत्कार या आयोजन की भव्यता पर टिकी नहीं होती। यह भी उतना ही जरूरी है कि समाज की सक्रिय भागीदारी कितनी है और परंपरा को जारी रखने के लिए कितनी कोशिश हो रही है।

इसी मौके पर एक अहम सवाल उठता है। क्या महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में तेलंगाना की पारंपरिक संस्कृति और लोकपरंपराओं को बनाए रखने की चुनौतियां बढ़ रही हैं? चंद्रपुर जिले में घुग्घूस और नकोडा जैसे इलाकों में तेलुगू भाषी समाज की सांस्कृतिक मौजूदगी लंबे समय से दिखती आई है। लेकिन बदलते सामाजिक हालात, नई पीढ़ी की जीवनशैली, रोजगार के लिए होने वाला पलायन, भाषा में बदलाव और सामुदायिक कार्यक्रमों में संभावित घटती भागीदारी की वजह से पारंपरिक संस्कृति के भविष्य पर चर्चा जरूरी है।

अगर स्थानीय स्तर पर तेलुगू भाषी परिवारों की संख्या, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भागीदारी या पारंपरिक गतिविधियों से जुड़ाव कम हो रहा है, तो यह सांस्कृतिक संरक्षण के लिहाज से चिंता की बात हो सकती है। हालांकि किसी एक कार्यक्रम में भीड़ कम दिखने के आधार पर यह नतीजा निकालना ठीक नहीं होगा कि समाज की आबादी घट रही है या संस्कृति खत्म हो रही है। इसके लिए स्थानीय आबादी, परिवारों के पलायन, भाषा के इस्तेमाल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भागीदारी से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन करना होगा।

फिर भी सवाल यह है कि आने वाले समय में नई पीढ़ी बतुकम्मा जैसे पारंपरिक पर्वों को पहले की पीढ़ियों जैसे उत्साह से और उनके पीछे के सांस्कृतिक महत्व को समझकर आगे ले जा पाएगी या नहीं। किसी भी संस्कृति को बचाना साल में एक बार उत्सव मनाने तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए परिवारों, सामाजिक संगठनों, सांस्कृतिक मंडलों और स्थानीय संस्थाओं को लगातार कोशिश करनी होगी।

घुग्घूस और नकोडा में बतुकम्मा उत्सव को और व्यापक बनाने के लिए बच्चों और युवाओं को लोकगीत, पारंपरिक नृत्य, फूलों की सजावट और इस पर्व के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व से परिचित कराया जा सकता है। स्कूल और सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोककला प्रतियोगिताएं और तेलुगू भाषा से जुड़ी गतिविधियां आयोजित हो सकती हैं। साथ ही स्थानीय आयोजकों को साल भर सांस्कृतिक गतिविधियां चलानी चाहिए, बुजुर्गों से पारंपरिक गीत और रीति-रिवाज इकट्ठा करने चाहिए और डिजिटल माध्यमों से इन परंपराओं को सहेजने की पहल करनी चाहिए।

सद्दुला बतुकम्मा प्रकृति के प्रति सम्मान, महिलाओं की सांस्कृतिक भूमिका और सामुदायिक एकता का संदेश देता है। महाराष्ट्र में रहने वाले तेलुगू भाषी समाज के लिए यह अपनी सांस्कृतिक पहचान को जिंदा रखने का अहम मौका है। घुग्घूस और नकोडा में इस पर्व का आयोजन होना इस बात का सकारात्मक संकेत है कि परंपरा कायम है। मगर यह उत्साह आगे भी बना रहे, इसके लिए समाज के हर तबके की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।

सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सद्दुला बतुकम्मा कितने उत्साह से मनाया गया। सवाल यह भी है कि आने वाली पीढ़ियों तक यह संस्कृति, भाषा और परंपरा पहुंचाने के लिए आज कौन से ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। समय रहते ठोस कदम उठे तो महाराष्ट्र के इन इलाकों में तेलंगाना की लोकसंस्कृति नई पीढ़ी तक असरदार तरीके से पहुंच सकेगी। वरना पारंपरिक कार्यक्रमों में भागीदारी और सांस्कृतिक लगाव घटता गया तो इस समृद्ध विरासत का दायरा सिमटने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

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