शिवसेना के नाम और चिन्ह पर सुप्रीम कोर्ट ने दिए 30 अक्टूबर तक सुनवाई पूरी करने के संकेत
शिवसेना पार्टी और धनुष-बाण चिन्ह किसका होगा, इस पर सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई चल रही है और फैसला अक्टूबर के आखिर या दिवाली से पहले आने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।
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शिवसेना पार्टी और धनुष-बाण चिन्ह पर असल हक किसका है, इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही अंतिम सुनवाई इसी महीने पूरी होने वाली है। जिस मामले का इंतजार चार साल से ज्यादा वक्त से हो रहा है, उसका फैसला अक्टूबर के आखिर में या दिवाली से पहले आने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।
मामले की जड़ 2022 में एकनाथ शिंदे की वह बगावत है, जिसके बाद अखंड शिवसेना में सीधी फूट पड़ गई थी। तब से राजनीतिक और कानूनी लड़ाई चल रही है, जो अब आखिरी दौर में पहुंच गई है।
हाल की एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने साफ संकेत दिए कि शिवसेना पार्टी और चिन्ह से जुड़े मामले की पूरी सुनवाई 30 अक्टूबर तक खत्म कर ली जाएगी। अगले हफ्ते चुनाव आयोग की तरफ से कोर्ट में पक्ष रखा जाएगा। उसके बाद शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे पार्टी की ओर से रिजॉइंडर यानी जवाबी दलील दाखिल की जाएगी और उसकी अंतिम बहस पूरी होगी। 30 अक्टूबर तक यह प्रक्रिया खत्म होने के बाद दिवाली से पहले या उसके फौरन बाद फैसला आने की प्रबल संभावना है।
उद्धव ठाकरे की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा। उनकी मुख्य दलील यह रही कि सिर्फ विधानमंडल में, यानी विधायकों में बहुमत होने के आधार पर मूल राजनीतिक पार्टी और उसका चिन्ह दूसरे गुट को नहीं दिया जा सकता। उनका कहना था कि फूट सिर्फ विधायकों तक सीमित थी, जबकि मूल संगठन और लाखों कार्यकर्ता आज भी ठाकरे के साथ हैं।
ठाकरे की पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने पार्टी के संविधान का उल्लंघन करके शिंदे की पार्टी को मान्यता दी। दलील दी गई कि पार्टी के 1999 के या संशोधित संविधान में मुख्य नेता का पद था ही नहीं, इसलिए एकनाथ शिंदे का मुख्य नेता चुना जाना मूल संविधान के खिलाफ और गैरकानूनी है।
शिंदे की शिवसेना की ओर से वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के फैसले का समर्थन करते हुए दलीलें रखीं। शिंदे की शिवसेना के मुताबिक विधायक दल और मूल राजनीतिक पार्टी दो अलग इकाइयां नहीं हो सकतीं, क्योंकि पार्टी की असली ताकत वहीं से दिखती है। उनकी दलील थी कि उद्धव ठाकरे के दौर में पार्टी के भीतर लोकतंत्र पूरी तरह खत्म हो गया था और पार्टी प्रमुख पद के इर्द-गिर्द एकाधिकारशाही बन गई थी। साथ ही कहा गया कि 2011 के बाद संशोधित किया गया कोई नया पार्टी संविधान चुनाव आयोग को आधिकारिक तौर पर सौंपे जाने का सबूत नहीं है। इसलिए बहुमत और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को देखते हुए चुनाव आयोग का फैसला पूरी तरह सही था, ऐसा उन्होंने कहा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों ने भी कुछ अहम बातें कहीं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि पार्टी और चिन्ह के हक का सवाल हो तो सिर्फ विधानमंडल का संख्याबल नहीं, बल्कि राजनीतिक पार्टी को ही सबसे मुख्य घटक माना जाना चाहिए। जब शिंदे की शिवसेना ने पार्टी में लोकतंत्र न होने का मुद्दा उठाया, तो कोर्ट ने साफ किया कि पार्टी में लोकतंत्र कैसे चलता है, इस पर अंतिम फैसला देने के बजाय वह यहां चुनाव आयोग के फैसले की सिर्फ न्यायिक समीक्षा करने बैठी है।
कोर्ट ने यह कानूनी सवाल भी उठाया कि विधायकों की अयोग्यता का मुद्दा विधानसभा अध्यक्ष के पास लंबित था, तब चुनाव आयोग ने पार्टी और चिन्ह पर इतनी जल्दी फैसला क्यों लिया। कोर्ट ने यह भी पूछा कि आयोग ने दूसरे विकल्पों पर विचार क्यों नहीं किया।
माना जा रहा है कि यह फैसला सिर्फ महाराष्ट्र की राजनीति नहीं, बल्कि देश भर में पार्टियों के भीतर होने वाली बगावत की राजनीति के लिए भी अहम होगा। एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे, दोनों नेताओं के लिए यह फैसला बेहद मायने रखता है, और अक्टूबर के आखिर में होने वाली सुनवाई और उसके बाद आने वाले फैसले पर पूरे देश की नजर है।