शिक्षा पर सबसे कम खर्च करने वालों में तेलंगाना और कर्नाटक, दिल्ली सबसे आगे
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जीडीपी का कम से कम 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने को कहती है, पर तेलंगाना और कर्नाटक में यह हिस्सा 1.3 से 1.7 प्रतिशत के आसपास है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
भारत को दुनिया का सबसे युवा आबादी वाला देश कहा जाता है, और किसी भी देश के नौजवानों का भविष्य वहां की पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था पर टिका होता है। केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में सिफारिश की गई है कि केंद्र और राज्य मिलकर अपनी जीडीपी का कम से कम 6 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च करें। लेकिन हाल के सरकारी आंकड़ों, आरबीआई और नीति आयोग की रिपोर्ट को देखें तो कई राज्यों में हालात इससे बिल्कुल उलटे दिखते हैं।
ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के जीएसडीपी और कुल बजट के हिसाब से शिक्षा पर सबसे कम खर्च करने वाले राज्यों में तेलंगाना और कर्नाटक के नाम सबसे ऊपर आते हैं। राज्यों के कुल आर्थिक योगदान के प्रतिशत के रूप में देखा जाए तो ये दोनों राज्य शिक्षा पर सिर्फ 1.3 से 1.7 प्रतिशत के आसपास खर्च कर रहे हैं। यह देश में सबसे कम आवंटनों में से एक है।
नीति आयोग की उच्च शिक्षा से जुड़ी हाल की रिपोर्ट भी यही तस्वीर दिखाती है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली जैसे राज्य कुल बजट की प्राथमिकताओं में शिक्षा को सबसे ऊपर रखते हैं, जबकि तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्य उच्च शिक्षा और कुल स्कूली शिक्षा के खर्च के मामले में काफी पीछे रह गए हैं।
अब रकम की बात करें तो इस वित्त वर्ष में देश का कुल केंद्रीय शिक्षा बजट करीब 1.39 लाख करोड़ रुपये तय किया गया है। राज्यों के स्तर पर महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य शिक्षा के लिए करीब 1.05 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम रिकॉर्ड बजट रख रहे हैं। वहीं दक्षिण और मध्य भारत के कई राज्य इसके मुकाबले काफी कम रकम खर्च कर रहे हैं।
मिसाल के तौर पर, सबसे कम अनुपात वाले राज्यों में शामिल तेलंगाना का सालाना शिक्षा बजट करीब 27,663 करोड़ से 44,054 करोड़ रुपये के बीच सिमटा रहता है। इसके उलट मध्य प्रदेश करीब 52,917 करोड़ और गुजरात 63,184 करोड़ रुपये के साथ कुल रकम के मामले में काफी आगे हैं। लेकिन तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्य, जिन्हें आईटी हब माना जाता है, सरकार के कुल बजट की तुलना में शिक्षा का प्रतिशत हिस्सा लगातार घटाते जा रहे हैं।
इन राज्यों में शिक्षा का बजट कम रखने के पीछे कई प्रशासनिक और आर्थिक कारण बताए जा रहे हैं। पहला बड़ा कारण यह है कि तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों का फिलहाल मुख्य जोर बुनियादी ढांचे के विकास को बढ़ावा देने पर है। दूसरा बड़ा कारण इन राज्यों में चल रही लोक कल्याण वाली मुफ्त योजनाएं हैं, जिन पर बजट का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है।
इसी वजह से सामाजिक क्षेत्र के लिए, खासकर सरकारी स्कूलों और कॉलेजों के आधुनिकीकरण और नए शिक्षकों की भर्ती के लिए सरकार के पास पूरा पैसा नहीं बचता।