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14:01 IST

ओडिशा में टीचर बच्चों को 'आलसी' या 'जिद्दी' नहीं कह पाएंगे, मानसिक सेहत पर नई SOP जारी

ओडिशा सरकार ने आंगनवाड़ी से विश्वविद्यालय तक सभी संस्थाओं के लिए बच्चों और युवाओं की मानसिक सेहत पर अनिवार्य SOP जारी की है।

ओडिशा में टीचर बच्चों को 'आलसी' या 'जिद्दी' नहीं कह पाएंगे, मानसिक सेहत पर नई SOP जारी तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और पढ़ाई के भारी दबाव का असर बच्चों की मानसिक सेहत पर पड़ रहा है। कई बार बच्चे सुस्त दिखते हैं या कम नंबर लाते हैं, तो लोग उन्हें 'आलसी' या 'जिद्दी' कहकर छोड़ देते हैं। लेकिन इसके पीछे मानसिक तनाव या डिप्रेशन भी हो सकता है। इसी मुद्दे को समझते हुए ओडिशा सरकार ने एक अहम कदम उठाया है।

राज्य सरकार ने आंगनवाड़ी केंद्रों से लेकर स्कूल और विश्वविद्यालयों तक, सभी संस्थाओं के लिए अनिवार्य मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की है। इस गाइडलाइन का मकसद बच्चों और युवाओं की मानसिक सेहत की हिफाजत करना और उन्हें अच्छा माहौल देना है। अब स्कूलों में बच्चों का अपमान करने या उन पर ताने कसने वाले शिक्षकों पर कार्रवाई हो सकती है। यह व्यवस्था सिर्फ कागजी आदेश नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में एक संवेदनशील बदलाव की शुरुआत है।

यह SOP 'ऑपरेशनल गाइडलाइंस ऑन मेंटल हेल्थ अँड वेल-बीइंग ऑफ चिल्ड्रन्स, अडोलसेंट्स अँड यंग अडल्ट्स' नाम की रिपोर्ट पर आधारित है। इसके तहत शिक्षकों और संस्थाओं के स्टाफ को बच्चों के साथ बहुत सावधानी से पेश आने को कहा गया है। किसी भी विद्यार्थी को सबके सामने डांटना, उसे नीचा दिखाने वाले शब्द कहना या बेइज्जत करना पूरी तरह मना है। बच्चे के अजीब बर्ताव या पढ़ाई में मन न लगने के पीछे तनाव छिपा हो सकता है, इसे वक्त रहते पहचानना जरूरी है।

नई SOP के मुताबिक अब कोई शिक्षक या स्कूल स्टाफ किसी भी विद्यार्थी को 'आलसी', 'जिद्दी' या दूसरे अपमानजनक शब्दों से नहीं बुला सकेगा। अक्सर बच्चे जब समय पर होमवर्क नहीं करते या क्लास में ध्यान नहीं देते, तो उन्हें सबके सामने सुना दिया जाता है। सरकार का मानना है कि इस तरह सबके सामने बेइज्जती से बच्चों के मन में हीन भावना आती है और वे निराशा में जा सकते हैं। इसकी जगह उन्हें सकारात्मक और हौसला देने वाली भाषा में बात करनी होगी।

बच्चों का तनाव वक्त रहते पकड़ने के लिए SOP में एक खास नियम रखा गया है। अगर कोई विद्यार्थी लगातार 2 हफ्ते से ज्यादा बहुत उदास रहता है, डर लगने की बात कहता है, बिना वजह चिड़चिड़ा रहता है या उसका बर्ताव हिंसक हो गया है, तो इसे आम बात नहीं माना जाएगा। ऐसे मामलों को तुरंत गंभीरता से लिया जाएगा। स्कूल प्रशासन उस विद्यार्थी की पहचान करेगा, उसे जरूरी काउंसलिंग देगा और जरूरत पड़ने पर मानसिक सेहत के विशेषज्ञ के पास भेजेगा।

विद्यार्थियों की मानसिक हालत को ठीक से परखने के लिए उन्हें 3 श्रेणियों में बांटा जाएगा: ग्रीन, यलो और रेड। इस कलर-कोडिंग सिस्टम से तय होगा कि किस बच्चे को सामान्य निगरानी चाहिए और किसे फौरन मेडिकल या मानसिक मदद की जरूरत है। इसके अलावा परीक्षा के भारी दबाव से निपटने के लिए बेहतर दिनचर्या की सलाह दी गई है। इसमें हर 25 मिनट की पढ़ाई के बाद 5 मिनट का ब्रेक लेने, गहरी सांस लेने का अभ्यास करने और पूरी नींद लेने की सिफारिश की गई है।

सिर्फ स्कूल ही नहीं, कॉलेज और विश्वविद्यालय जैसी उच्च शिक्षा संस्थाओं के लिए भी गाइडलाइन तय की गई है। यूनिवर्सिटी कैंपस में कई विद्यार्थी रैगिंग, भेदभाव, नशाखोरी, घर से दूर रहने के अकेलेपन और रिश्तों में नाकामी जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझते हैं। इन समस्याओं का हल निकालने के लिए हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में 'मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र' बनाने की सिफारिश की गई है।

सरकार को भरोसा है कि इन कदमों से शैक्षणिक संस्थाओं का माहौल तनावमुक्त बनेगा और नौजवान मानसिक रूप से मजबूत होने के साथ खुद को सुरक्षित भी महसूस करेंगे।

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