MPT और MOT की डिग्री अब स्पेशलाइजेशन के साथ मिलेगी, ऑप्टोमेट्री का कोर्स 5 साल का
UGC ने MPT और MOT की डिग्री विशेषज्ञता के नाम के साथ देने का निर्देश दिया है। बैचलर ऑफ ऑप्टोमेट्री की न्यूनतम अवधि 4 से बढ़ाकर 5 वर्ष की गई है। नई व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू होगी।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने साफ कर दिया है कि मास्टर ऑफ फिजियोथेरपी (MPT) और मास्टर ऑफ ऑक्युपेशनल थेरपी (MOT) की डिग्री अब सिर्फ सामान्य नाम से नहीं दी जाएगी। डिग्री के साथ संबंधित विशेषज्ञता, यानी स्पेशलाइजेशन, भी जुड़ी होगी। यह नियम शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू होगा।
यह बदलाव राष्ट्रीय सहयोगी एवं स्वास्थ्य सेवा व्यवसाय आयोग (NCAHP) की सिफारिश पर हुआ है। इसी सिफारिश के आधार पर यूजीसी ने डिग्री से जुड़ी अपनी अधिसूचना में संशोधन किया है।
MOT में जो विशेषज्ञता क्षेत्र रखे गए हैं, उनमें मस्कुलोस्केलेटल, पीडियाट्रिक्स एवं नियोनेटोलॉजी, न्यूरोलॉजी, मानसिक स्वास्थ्य, कार्डियक एवं पल्मोनरी, रिहैबिलिटेशन, जेरियाट्रिक्स और हैंड एंड ऑन्कोलॉजी शामिल हैं।
MPT के लिए भी अलग विशेषज्ञताएं तय की गई हैं। इनमें स्पोर्ट्स साइंस, पीडियाट्रिक्स एवं नियोनेटोलॉजी, ऑब्स्टेट्रिक्स एवं गायनेकोलॉजी, ऑन्कोलॉजी और कम्युनिटी रिहैबिलिटेशन आते हैं।
बदलाव सिर्फ इन दो डिग्रियों तक सीमित नहीं है। यूजीसी ने अलाइड और हेल्थकेयर क्षेत्र की कई दूसरी डिग्रियों के नाम और अवधि में भी फेरबदल किया है। सबसे बड़ा बदलाव बैचलर ऑफ ऑप्टोमेट्री में है, जिसकी न्यूनतम अवधि 4 साल से बढ़ाकर 5 वर्ष कर दी गई है।
इसके अलावा मेडिकल लेबोरेटरी साइंस, इमरजेंसी मेडिकल टेक्नोलॉजी, एनेस्थीसिया एवं ऑपरेशन थिएटर टेक्नोलॉजी, मेडिकल रेडियोलॉजी एवं इमेजिंग, रेडिएशन थेरेपी, न्यूक्लियर मेडिसिन टेक्नोलॉजी और मेडिकल फिजिक्स जैसे कई क्षेत्रों में नई विशेषज्ञताएं और डिग्रियां जोड़ी गई हैं।
जो विद्यार्थी 2026-27 से पहले दाखिला ले चुके हैं, उनके लिए राहत है। उन्हें पुरानी अधिसूचना के हिसाब से डिग्री दी जा सकेगी।
विशेषज्ञता पर आधारित कोर्स शुरू होने से विद्यार्थियों को अपने चुने हुए क्षेत्र में गहरी व्यावहारिक और सैद्धांतिक जानकारी हासिल करने का मौका मिलेगा। हेल्थकेयर सेक्टर में मांग लगातार बढ़ रही है। इसे देखते हुए यह बदलाव स्नातकों के लिए सिर्फ देश में ही नहीं, विदेशों में भी रोजगार के नए रास्ते खोलेगा। अस्पतालों और अनुसंधान संस्थानों को भी संबंधित विशेषज्ञता वाले प्रशिक्षित पेशेवर मिल सकेंगे।
यूजीसी का कहना है कि यह कदम अलाइड और हेल्थकेयर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और राष्ट्रीय स्तर पर एक जैसे मानक लाने के लिए उठाया गया है। आयोग ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया है कि वे नए दिशानिर्देशों के मुताबिक अपने पाठ्यक्रमों में जरूरी संशोधन करें और शैक्षणिक सत्र 2026-27 से इन्हें सख्ती से लागू करें।