सोम‌वार, 19 अक्टूबर 2026

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08:27 IST

पानी की किल्लत से निर्माण सेक्टर पर सूखे की मार, मजदूर दोहरे संकट में

महाराष्ट्र में सूखे का असर अब खेतों से निकलकर निर्माण सेक्टर और राज्य की अर्थव्यवस्था तक पहुंच गया है।

पानी की किल्लत से निर्माण सेक्टर पर सूखे की मार, मजदूर दोहरे संकट में तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

महाराष्ट्र में सूखे का असर अब सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहा, वह राज्य की अर्थव्यवस्था में भी दिखने लगा है। पानी की किल्लत की वजह से कहीं सीमेंट रोड का काम रोका जा रहा है, तो कहीं निर्माण के लिए पीने के पानी के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में अहम जगह रखने वाले निर्माण सेक्टर के सामने अब नया संकट खड़ा हो गया है।

राज्य के 358 में से 305 तहसीलों में सूखा घोषित किया गया है। यानी राज्य की करीब 85 प्रतिशत तहसीलें सूखे की जद में हैं, और बारिश की कमी करीब 18 प्रतिशत है। सूखे की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर से शहरी और ग्रामीण स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को कम से कम दस प्रतिशत पानी कटौती लागू करने के निर्देश दिए हैं। पीने के पानी को पहली प्राथमिकता देने के साथ निर्माण में प्रक्रिया किए हुए सीवेज के पानी के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है।

पुणे में निर्माण के लिए पीने का पानी इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी गई है। नागपुर में पानी की किल्लत की वजह से सीमेंट रोड के पांचवें चरण का काम रोक दिया गया है। इसका मतलब है कि सूखे की मार अब सीधे निर्माण के कामों तक पहुंच चुकी है।

इस साल बारिश की कमी रही, भूजल का स्तर नीचे गया और बांधों में पानी का स्टॉक सीमित है। इसी वजह से पीने के पानी को प्राथमिकता देने की नौबत आई है, और उसका असर अब निर्माण सेक्टर पर पड़ रहा है।

निर्माण का महत्व सिर्फ इमारतें खड़ी करने तक नहीं है। सीमेंट, स्टील, रेत, ईंट, ट्रांसपोर्ट, हार्डवेयर और मजदूरों की रोजी-रोटी, ऐसे कई धंधे इससे जुड़े हैं। अगर काम धीमे पड़ते हैं, तो उसका सीधा असर मजदूर, राजमिस्त्री, सेंट्रिंग मजदूर, ट्रक ड्राइवर, सीमेंट बेचने वालों और इस धंधे पर निर्भर हजारों छोटे कारोबारियों पर हो सकता है।

महाराष्ट्र के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2025-26 में राज्य के निर्माण सेक्टर की वास्तविक बढ़त 7.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। राज्य के GSVA में इस सेक्टर का हिस्सा करीब 6 प्रतिशत है।

खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और निर्माण रोजगार का बड़ा सहारा है। इस साल के सूखे ने दोनों के सामने संकट खड़ा कर दिया है। पहले खेती से रोजगार छिना और अब निर्माण पर भी सूखे की मार पड़ी, तो ये मजदूर जिएंगे कैसे, यह सवाल सबको सता रहा है। सूखे के इस नए आर्थिक संकट ने चिंता और बढ़ा दी है।

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