ट्रेन के आगे कूदना हादसा नहीं, खुदकुशी की कोशिश: हाईकोर्ट ने मुआवजे की मांग ठुकराई
मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने कहा कि ट्रेन के सामने कूदकर जान देने की कोशिश रेलवे दुर्घटना नहीं है, इसलिए रेलवे मुआवजा देने को बाध्य नहीं।
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नागपुर: ट्रेन के सामने कूदकर खुदकुशी की कोशिश करने को रेलवे दुर्घटना नहीं माना जा सकता और ऐसे में रेलवे प्रशासन मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं है। मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एक अहम मामले में यही फैसला सुनाते हुए मुआवजे की मांग खारिज कर दी।
मामला मध्य प्रदेश के इंदौर के रहने वाले संतोष चव्हाण का है। 12 दिसंबर 2017 को नागपुर रेलवे स्टेशन पर वे संघमित्रा एक्सप्रेस की चपेट में आ गए थे। इस हादसे में उनका दाहिना हाथ कंधे से कट गया था। इसके बाद चव्हाण ने रेलवे दावा न्यायाधिकरण में अर्जी देकर चार लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी।
चव्हाण की तरफ से दावा किया गया कि वे ट्रेन में चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, तभी अचानक धक्का लगने से उनका संतुलन बिगड़ गया और वे ट्रेन की चपेट में आ गए। उन्होंने इसे एक आकस्मिक रेलवे दुर्घटना बताया था।
रेलवे प्रशासन ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। रेलवे का कहना था कि चव्हाण ने जानबूझकर इंजन के सामने कूदकर खुदकुशी की कोशिश की थी। इसलिए यह घटना रेलवे दुर्घटना की श्रेणी में नहीं आती और इसके लिए मुआवजा नहीं दिया जा सकता।
सुनवाई के दौरान रेलवे ने न्यायाधिकरण के सामने तीन लोगों के शपथ-पत्र रखे। ये रेलवे गार्ड, असिस्टेंट लोको पायलट और कैरेज एंड वैगन विभाग के लाइन ब्लॉकर के थे। तीनों प्रत्यक्षदर्शियों ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने एक आदमी को ट्रेन के इंजन के सामने कूदते देखा था। घटना के फौरन बाद उन्होंने यह बात रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों को बता दी थी।
खास बात यह रही कि चव्हाण की ओर से इन तीनों गवाहों से जिरह यानी प्रतिपरीक्षण भी नहीं किया गया। न्यायाधिकरण ने इन बयानों और रिकॉर्ड पर मौजूद दूसरे सबूतों के आधार पर घटना को दुर्घटना मानने से इनकार कर दिया।
रेलवे दावा न्यायाधिकरण ने 27 मई 2021 को उपलब्ध सबूतों के आधार पर चव्हाण की मुआवजे की अर्जी खारिज कर दी थी। न्यायाधिकरण ने माना था कि यह सामान्य रेलवे दुर्घटना का नहीं, बल्कि खुदकुशी की कोशिश का मामला है।
चव्हाण ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन अपील लंबित रहने के दौरान उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनके परिवार के सदस्यों ने उनकी ओर से अपील की कार्यवाही आगे बढ़ाई।
हाईकोर्ट ने रेलवे दावा न्यायाधिकरण के निष्कर्षों और उपलब्ध सबूतों की जांच की। अदालत ने प्रत्यक्षदर्शियों के शपथ-पत्र और बाकी रिकॉर्ड को अहम माना और न्यायाधिकरण का फैसला बरकरार रखा।
अदालत ने साफ किया कि रेलवे अधिनियम की धारा 124-ए के तहत रेलवे दुर्घटना में मुआवजे का प्रावधान है, लेकिन खुदकुशी की कोशिश या खुद को पहुंचाई गई चोट इस प्रावधान के दायरे में नहीं आती। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने चव्हाण के परिवार की मुआवजे की मांग वाली अपील खारिज कर दी।
फैसले से साफ है कि रेलवे से मुआवजा पाने के लिए सिर्फ ट्रेन की चपेट में आना काफी नहीं है। घटना सचमुच आकस्मिक दुर्घटना थी या जानबूझकर की गई खुदकुशी की कोशिश, यह उपलब्ध सबूतों के आधार पर तय होगा। इस मामले में प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों ने घटना की असलियत साफ करने में अहम भूमिका निभाई।