नागपुर पदवीधर सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी 3,271 वोट से जीते, भाजपा के कोहले हारे
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
विधान परिषद की नागपुर पदवीधर सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को हराया। दूसरी पसंद के वोटों की गिनती के बाद नतीजे का गणित बदला।
नागपुर को भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गढ़ माना जाता है। यहां कांग्रेस की जीत के बाद सियासी गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। विधान परिषद की नागपुर पदवीधर सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले को हरा दिया। गिनती के दौरान तस्वीर कैसे बदली और दूसरी पसंद के वोटों का हिसाब कैसे चला, यह इस चुनाव में खास तौर पर चर्चा का मुद्दा रहा। अब भाजपा की हार के पीछे की वजहें टटोली जा रही हैं।
गिनती की शुरुआत से ही दोनों बड़ी पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला दिखा। बताया जा रहा है कि निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले के बैलेट पेपर पर दूसरी पसंद के वोटों की गिनती शुरू होने के बाद नतीजे का गणित बदल गया। इसके बाद अभिजीत वंजारी की बढ़त बढ़ती गई और कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश का माहौल बन गया।
दूसरी तरफ, भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले ने गिनती पूरी होने से पहले जीत या हार को लेकर कोई अंतिम नतीजा निकालने से इनकार कर दिया था। उन्होंने दावा किया था कि भाजपा के करीब नौ हजार वोट रद्द हो गए हैं और इसी आधार पर उन्होंने गिनती की प्रक्रिया पर अपनी बात रखी थी।
पसंदक्रम के हिसाब से होने वाली गिनती में हर वोट की अहमियत होती है। पहली पसंद के वोटों के बाद अगली पसंद के वोट किस उम्मीदवार को कितना फायदा पहुंचाते हैं, इस पर नतीजा टिक सकता है।
मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक अभिजीत वंजारी (कांग्रेस) को 67,231 वोट मिले, जबकि सुधाकर कोहले (भाजपा) को 63,960 वोट मिले। जीत का अंतर 3,271 वोट का रहा। निर्दलीय नितेश कराले को 25,908 वोट मिले। इस नतीजे से भाजपा को नागपुर में सियासी झटका लगा है। संघ के असर वाले इलाके में कांग्रेस की इस कामयाबी से उसके कार्यकर्ताओं में उत्साह है।
नितेश कराले को 25 हजार से ज्यादा वोट मिले, इसलिए उनके बैलेट पर अगली पसंद के वोटों की ओर ध्यान गया। पदवीधर सीट का चुनाव पसंदक्रम पर आधारित है, इसलिए गिनती के अगले चरणों में उम्मीदवारों के वोट बदल सकते हैं। फिर भी यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि कराले को मिले सारे वोट कांग्रेस की तरफ गए। इसके लिए गिनती का आधिकारिक ब्योरा देखना जरूरी है।
भाजपा की हार का विश्लेषण करते समय कई बातों को देखना पड़ता है। ग्रेजुएट मतदाताओं के सवाल, उम्मीदवारों की छवि, स्थानीय स्तर पर कामकाज और पार्टियों की संगठन की ताकत वोटिंग पर असर डाल सकती है। रोजगार के मौके, शिक्षा के मसले, युवाओं के सवाल और स्थानीय विकास पर मतदाताओं ने क्या रुख अपनाया, यह भी अहम है। पसंदक्रम की गिनती से आखिरी नतीजे में आया बदलाव भी इस चुनाव की चर्चा का मुख्य विषय बन गया है। हालांकि भाजपा की हार का कोई एक कारण ही निर्णायक रहा, यह पक्के तौर पर कहने के लिए अलग और आधिकारिक जानकारी चाहिए।
नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है और भाजपा की राजनीति के लिए अहम इलाका माना जाता है। ऐसी सीट पर कांग्रेस की जीत से इस नतीजे का महत्व बढ़ गया है। इससे कांग्रेस को स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ाने का मौका मिल सकता है। आने वाले चुनावों के लिहाज से भी इस नतीजे को पार्टी के लिए अहम माना जा रहा है। लेकिन एक सीट की जीत से पूरे राज्य के सियासी माहौल के बारे में निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा।
अभिजीत वंजारी की 3,271 वोट की जीत, नितेश कराले को मिले वोट और पसंदक्रम की गिनती की प्रक्रिया, ये सब बातें चर्चा में हैं। अब राजनीतिक जानकारों की नजर इस पर है कि भाजपा इस नतीजे से क्या सबक लेती है और कांग्रेस इस जीत को आगे की राजनीति में कैसे भुनाती है। कुल मिलाकर नागपुर के नतीजे ने दिखाया है कि पारंपरिक गढ़ में भी चुनाव का गणित बदल सकता है।
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