नागपुर में विजयादशमी पर भागवत बोले, आज़ादी की लड़ाई से बड़े बलिदान की ज़रूरत
नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने एकता, विकास और नई पीढ़ी की ज़िम्मेदारी पर बात की।
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नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विजयादशमी कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश की एकता, सनातन धर्म, विकास और नई पीढ़ी की ज़िम्मेदारी पर अपनी बात रखी। उन्होंने देशवासियों से कहा कि 'स्व' की रक्षा के लिए महापुरुषों ने बलिदान दिया था और अब स्वतंत्रता आंदोलन से भी बड़े बलिदान की ज़रूरत है।
भागवत ने अपने भाषण में भारत की एकात्मता का मुद्दा उठाया। उनके मुताबिक संविधान की प्रस्तावना में लिखा 'हम भारत के लोग' विविधता से बनी भावनात्मक एकता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि देश में कई भाषाएँ, जातियाँ, पंथ, संप्रदाय, प्रांत और परंपराएँ हैं। फिर भी जो सोच सबको अपनाती है और हर किसी को अपनेपन से देखती है, वही राष्ट्रीय एकता की बुनियाद बन सकती है।
भागवत ने कहा कि भारत की सनातन परंपरा विविधता का सम्मान करना सिखाती है। विविधता बदलती रहती है, लेकिन पूरे अस्तित्व में एकात्मता का तत्त्व शाश्वत है। उनके अनुसार इस तत्त्व को समझना और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उतारना ज़रूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने जब अपनी एकात्मता के मूल्यों की अनदेखी की, तब देश की अधोगति हुई और उसे कई सदियों तक गुलामी सहनी पड़ी। भागवत ने बताया कि कई बड़े प्रयासों और अनगिनत बलिदानों के बाद देश को आज़ादी मिली। अब फिर एकता और तरक्की की राह पर आगे बढ़ने के लिए समाज को अपने भूले हुए मूल्यों को समझकर अपनाना होगा।
भागवत ने कहा कि पूर्वजों ने 'स्व' की रक्षा के लिए बलिदान दिया और अब देश के भविष्य के लिए उससे भी बड़े बलिदान की तैयारी रखनी होगी। उन्होंने रेखांकित किया कि भारत को विश्वगुरु बनाने की ज़िम्मेदारी नई पीढ़ी के कंधों पर है।
दुनिया के हालात पर भागवत ने कहा कि वैश्विक स्तर पर राजनीतिक संकट और अलग-अलग देशों के बीच टकराव बढ़ रहे हैं। उनके मुताबिक इन टकरावों का हल खोजने के लिए दुनिया उम्मीद से भारत के विचारों की तरफ देख रही है। उन्होंने कहा कि दूसरे देशों के साथ भारत के बढ़ते रिश्ते आगे भी मज़बूत रहने चाहिए।
विज्ञान और तकनीक की तरक्की को भागवत ने ज़रूरी बताया, पर साथ ही कहा कि जानकारी का सही इस्तेमाल करने के लिए विवेक भी उतना ही अहम है। आज तरह-तरह की जानकारी आसानी से मिल रही है, इसलिए हर किसी में सही और गलत का फर्क पहचानने की क्षमता होनी चाहिए। जानकारी के प्रसार को लेकर शासन और प्रशासन को भी सोचना चाहिए, यह बात भी भागवत ने कही।
नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा का हवाला देते हुए भागवत ने विकास के नज़रिये पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में ऐसी आपदाओं पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है। उनके शब्दों में विकास के नाम पर प्रकृति को नुकसान पहुँचे और आखिर में इंसान का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए, ऐसी हालत नहीं बननी चाहिए।
कुल मिलाकर, विजयादशमी कार्यक्रम में भागवत ने राष्ट्रीय एकात्मता, सनातन मूल्यों, समझदारी से जानकारी के इस्तेमाल और पर्यावरण के अनुकूल विकास पर ज़ोर दिया। उनके भाषण का मुख्य संदेश यह रहा कि देश को विश्वगुरु बनाने के लिए नई पीढ़ी सिर्फ सोचे नहीं, बल्कि मूल्यों पर आधारित आचरण और सामाजिक ज़िम्मेदारी भी अपनाए।