नागपुर में संघ के विजयादशमी उत्सव में मोहन भागवत बोले, आजादी के आंदोलन से बड़े बलिदान की जरूरत
नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक मोहन भागवत ने एकता, आचरण, विकास और सूचना की पहुंच पर बात की।
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नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी उत्सव 2026 में सरसंघचालक मोहन भागवत ने देशवासियों से अपील की। उन्होंने कहा कि एकता का तत्व अटल और शाश्वत है, जबकि हमारी विविधता बदलती रहती है। भागवत के मुताबिक विविधता में एकता को भूल जाने से हम कमजोर हुए हैं और आचरण भूल जाने से हमारी दुर्गति हुई है।
भागवत ने कहा कि विविधता में लचीलापन सनातन धर्म की खासियत है। इसलिए विवेक जागा रखकर नई बातें सीखनी चाहिए। उनका कहना था कि भारत को विश्वगुरु बनाने की जिम्मेदारी अब नई पीढ़ी के कंधों पर है। उन्होंने यह भी कहा कि 'स्व' की रक्षा के लिए महापुरुषों ने बलिदान दिया और अब हमें स्वतंत्रता आंदोलन से भी बड़ा बलिदान देना पड़ेगा।
संविधान की उद्देशिका का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि उसमें हमने खुद को 'हम भारत के लोग' कहा है। उनके अनुसार यह उस समाज का प्रतीक है जो विविधता के बावजूद भावनात्मक रूप से एक है। इन भावनात्मक बंधनों को और मजबूत कैसे किया जाए, इसका मार्गदर्शन भी संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांतों से साफ मिलता है, ऐसा उन्होंने कहा।
भागवत ने कहा कि इस भावनात्मक एकता का सीधा अनुभव जिस तत्व से होता है, और उसे समझाने वाला दुनिया का सबसे श्रेष्ठ दर्शन हमारे पास होने के बावजूद हमारा आचरण उससे पूरी तरह अलग और हीन हो गया। नतीजा यह हुआ, उनके मुताबिक, कि विश्वगुरु के स्थान से हमारा पतन होता गया और कई सदियों तक हमें गुलामी भुगतनी पड़ी।
उन्होंने कहा कि कई महान प्रयासों और अनगिनत बलिदानों से उस दुर्भाग्यपूर्ण हालत से निकलने के बाद हम फिर एकता और तरक्की के रास्ते पर चलने लगे हैं। इसलिए भूले हुए इस तत्व को साफ समझना होगा, दिल से अपनाना होगा और जीवन के हर पहलू में उसके मुताबिक जरूरी गुण विकसित करने होंगे, ऐसा भागवत ने कहा।
नेपाल का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि वहां प्राकृतिक संकट आया और यह सोचना जरूरी है कि वह क्यों आया। उनके अनुसार पूरे हिमालय क्षेत्र में ऐसा संकट आ रहा है। उन्होंने विकास की सही दृष्टि बनाने की जरूरत बताई और कहा कि विकास के नाम पर ऐसी स्थिति न आए कि विकास करने वाला इंसान ही न बचे।
दुनिया के हालात पर भागवत ने कहा कि वैश्विक स्तर पर राजनीतिक संकट और संघर्ष बढ़े हैं। उनका कहना था कि दुनिया जानती है कि इन संघर्षों का जवाब भारत के पास है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों के साथ जो संपर्क और संबंध बने हैं, वे आगे भी चलते रहने चाहिए।
विज्ञान और तकनीक की तरक्की पर भागवत ने कहा कि वह हो रही है और होनी भी चाहिए। लेकिन इससे हर तरह की जानकारी सबके लिए खुल गई है, यह भी याद रखना चाहिए। जिन्हें यह जानकारी मिल रही है, उनमें उसे पचाने की क्षमता, सही-गलत की पहचान और विवेक होना जरूरी है, ऐसा उन्होंने कहा। भागवत के मुताबिक आज यह परखे बिना जानकारी सबको मिल रही है कि उस व्यक्ति में विवेक है या नहीं। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में जानकारी देने वाले माध्यमों पर पाबंदियां लगाई गई हैं और अपने देश में सरकार और प्रशासन को इस पर विचार करना चाहिए।
आगे बोलते हुए भागवत ने कहा कि भारत जैसे देश में, जो मत, पंथ, संप्रदाय, प्रांत, जाति, भाषा, खानपान और रीति-रिवाजों की विविधता से भरा है, इन सब विविधताओं को स्वीकार करने वाला, उनका सम्मान करने वाला और सबको अपनेपन से देखने वाला विचार ही हमारी एकता का आधार बन सकता है। उन्होंने कहा कि सौभाग्य से भारत में अनादिकाल से चली आ रही सनातन परंपरा हमें इसी सच्चाई का एहसास कराती है। भागवत के मुताबिक यह परंपरा बताती है कि सृष्टि की विविधता जितनी स्वाभाविक और बदलने वाली है, पूरे अस्तित्व की एकता उतना ही शाश्वत, दृढ़ और अटल सत्य है।