गुरूवार, 15 अक्टूबर 2026

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01:09 IST

नागपुर की CBI कोर्ट ने रेलवे सीनियर सेक्शन इंजीनियर को रिश्वत मामले में बरी किया

नागपुर की विशेष CBI अदालत ने रेलवे के सीनियर सेक्शन इंजीनियर (LOCO) राकेश कुमार शर्मा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के आरोपों से बरी कर दिया।

नागपुर की CBI कोर्ट ने रेलवे सीनियर सेक्शन इंजीनियर को रिश्वत मामले में बरी किया तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नागपुर की सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) की विशेष अदालत, एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) ने रेलवे के सीनियर सेक्शन इंजीनियर (LOCO) राकेश कुमार शर्मा को भ्रष्टाचार के एक मामले में बरी कर दिया है। मामला कोलकाता की एक कंपनी द्वारा लोकोमोटिव के ब्रेक शू की सप्लाई से जुड़ी कथित रिश्वत का था।

विशेष न्यायाधीश श्रीकांत पद्माकर गोंधलेकर की अदालत ने शर्मा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 12 और 13(2), धारा 13(1)(d) के साथ पढ़ते हुए, के आरोपों से बरी किया। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि शर्मा रेलवे ब्रेक शू के इंस्पेक्शन सर्टिफिकेट के बदले ऋद्धि सिद्धि उद्योग लिमिटेड के पदाधिकारियों से रिश्वत लेने की किसी व्यवस्था में शामिल थे।

मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने 22 गवाहों की गवाही कराई। बचाव पक्ष ने फोन टैपिंग की वैधता, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की भरोसेमंदी और शर्मा का CBI के बताए वित्तीय लेनदेन से कथित संबंध, इन तीनों बातों को चुनौती दी।

अभियोजन पक्ष के मुताबिक कोलकाता की ऋद्धि सिद्धि उद्योग लिमिटेड को रेलवे लोकोमोटिव के लिए ब्रेक शू सप्लाई करने का वर्क ऑर्डर मिला था। गोपनीय जानकारी के आधार पर CBI ने आरोप लगाया कि कंपनी के प्रतिनिधियों ने सप्लाई किए गए माल के इंस्पेक्शन सर्टिफिकेट को लेकर शर्मा से रिश्वत की बात की थी।

एजेंसी का दावा था कि उसने कंपनी के प्रतिनिधियों और आरोपी के बीच हुई कॉल और मैसेज को इंटरसेप्ट करने की इजाजत केंद्र सरकार से ली थी। CBI का आरोप था कि रिकॉर्ड की गई बातचीत में अवैध भुगतान की चर्चा थी। अभियोजन पक्ष ने यह भी दावा किया कि इन बातचीत के बाद लेनदेन की रकम के एक प्रतिशत के बराबर राशि शर्मा के बेटे के कथित बैंक खाते में जमा की गई। इसके बाद CBI ने शर्मा और कंपनी के दो पदाधिकारियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं और भारतीय दंड संहिता की धारा 120B (आपराधिक साजिश) के तहत मुकदमा चलाया।

शर्मा की ओर से पेश एडवोकेट प्रकाश नायडू ने दलील दी कि इंटरसेप्ट की गई फोन बातचीत पर अभियोजन का भरोसा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के मौलिक अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बचाव पक्ष ने कहा कि फोन इंटरसेप्शन को कानून के प्रावधानों और सुरक्षा उपायों का पालन करना होता है, और पब्लिक इमरजेंसी या सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी वैधानिक शर्तों को टाला नहीं जा सकता।

बचाव पक्ष के मुताबिक CBI यह साबित नहीं कर सकी कि फोन इंटरसेप्शन की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन हुआ। उसने यह सवाल भी उठाया कि कथित बातचीत में इस्तेमाल हुए मोबाइल फोन और सिम कार्ड का आरोपी से पक्का संबंध जोड़ा गया या नहीं। बचाव का कहना था कि संबंधित फोन कनेक्शन का मालिकाना और इस्तेमाल साबित किए बिना रिकॉर्डिंग से आरोपी की संलिप्तता भरोसे से साबित नहीं होती।

बैंक खाते में कथित रकम जमा होने को भी बचाव पक्ष ने चुनौती दी। एडवोकेट नायडू ने कहा कि अभियोजन खाताधारक और आरोपी के बीच जरूरी संबंध साबित नहीं कर सका, जिसमें यह सबूत भी शामिल है कि खाताधारक शर्मा का सगा बेटा है। बचाव का कहना था कि शर्मा और कथित साजिश से जोड़ने वाले सबूत के बिना यह जमा राशि आपराधिक जिम्मेदारी साबित नहीं करती।

मुकदमे में एक अहम दलील ब्रेक शू के इंस्पेक्शन या सर्टिफिकेशन में शर्मा की कथित भूमिका को लेकर थी। बचाव पक्ष ने रेलवे कर्मचारियों और जांच अधिकारियों की जिरह का हवाला देकर कहा कि सबूतों से यह साबित नहीं होता कि इंस्पेक्शन या सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया पर शर्मा का कोई अधिकार था। बचाव के मुताबिक रेलवे की नियुक्त की हुई स्वतंत्र एजेंसी RITES (Rail India Technical and Economic Service) सप्लाई किए गए माल की क्वालिटी जांचने के लिए जिम्मेदार थी।

बचाव पक्ष ने बताया कि RITES का सर्टिफिकेट जारी होने के बाद ऋद्धि सिद्धि को देय भुगतान का 95 प्रतिशत जारी हो गया था। फिर कंपनी को माल रेलवे के स्टोर्स विभाग में पहुंचाना था, जहां स्टोर मैनेजर मात्रा और संबंधित दस्तावेज जांचता था और उसके बाद बाकी पांच प्रतिशत जारी होता था। इस आधार पर बचाव ने कहा कि क्वालिटी सर्टिफिकेट जारी करने या कंपनी को भुगतान दिलाने में शर्मा की कोई भूमिका नहीं थी।

बचाव पक्ष ने जांच एजेंसी द्वारा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और रिकॉर्डिंग को संभालने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। एडवोकेट नायडू ने कहा कि प्रक्रिया कानूनी जरूरतों के मुताबिक नहीं थी और कानूनी वैधता तथा सबूत के तौर पर भरोसेमंदी साबित किए बिना कथित बातचीत पर भरोसा नहीं किया जा सकता। मुकदमे में पेश सबूतों और दलीलों पर विचार करने के बाद विशेष CBI कोर्ट ने शर्मा को आरोपों से बरी कर दिया।

आरोपी की ओर से एडवोकेट प्रकाश नायडू, सुरभि नायडू (गोडबोले), मितेश सिंह बैस, होमेश चौहान, ध्रुव शर्मा, नुपुर अग्रवाल, भाग्यश्री पराते, जागृति पाटिल और अनन्या चांदक पेश हुए। CBI की ओर से एडवोकेट सुमेध वानखेड़े ने पैरवी की। इस बरी होने के साथ इस मामले में शर्मा के खिलाफ मुकदमा खत्म हो गया है। कोर्ट के फैसले के सटीक निष्कर्ष और कानूनी आधार विस्तृत लिखित फैसले से सामने आएंगे।

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