बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

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19:55 IST

बीमार पिता के इलाज के लिए बड़ी बेटी बनी कानूनी अभिभावक, बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश

मुंबई हाईकोर्ट ने गंभीर रूप से बीमार पिता की बड़ी बेटी को उनका कानूनी अभिभावक माना, जिससे पिता की संपत्ति उन्हीं के इलाज में लग सकेगी।

मुंबई के एक परिवार के सामने अजीब उलझन खड़ी थी, जिसे बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुलझा दिया। पिता कोमा जैसी हालत में हैं, बेटियों ने इलाज पर अपने पास के करीब 60 लाख रुपये खर्च कर दिए और अब उनके पास पैसे नहीं बचे। दूसरी तरफ पिता के बैंक खाते में रकम है और उनके नाम पर स्थावर संपत्ति भी है, फिर भी उसे इलाज में लगाने में कानूनी अड़चन आ रही थी।

हाईकोर्ट ने गंभीर बीमारी की वजह से अपने कानूनी और आर्थिक फैसले खुद न ले पाने वाले पिता की बड़ी बेटी को उनके कानूनी अभिभावक के तौर पर मान्यता दे दी। इसके बाद पिता की संपत्ति को उन्हीं के इलाज में इस्तेमाल करने का रास्ता खुल गया है। चीफ जस्टिस महेशचंद्र त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत एम. सेठना की बेंच ने "पैरेंस पैट्रिए" के सिद्धांत के आधार पर यह आदेश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि यह है कि दो बहनों ने पिता के लिए याचिका दाखिल की थी। उनकी मां का निधन हो चुका है और पिता 2008 से लंबी बीमारी से जूझ रहे हैं। उनकी कई सर्जरी भी हो चुकी हैं। बेटियों ने इलाज का खर्च अपनी जेब से उठाया, लेकिन अब उनके पास पैसा नहीं रहा।

दिक्कत यह थी कि पिता दस्तखत नहीं कर सकते, इसलिए उनके खाते की रकम और संपत्ति का इलाज के लिए इस्तेमाल कैसे हो, यह सवाल खड़ा हो गया था। याचिकाकर्ताओं की तरफ से एडवोकेट भूषण राउत ने दलील दी कि "पैरेंस पैट्रिए" के सिद्धांत के तहत कोर्ट को अभिभावक नियुक्त करने का अधिकार है। उनकी मदद एडवोकेट किरण शिंदे ने की। कानून में ऐसी स्थिति में अभिभावक नियुक्त करने की साफ व्यवस्था नहीं है, फिर भी कोर्ट ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल किया।

कोर्ट ने 19 अगस्त 2026 को मेडिकल जांच के निर्देश दिए थे। इसके बाद सर जे.जे. अस्पताल के तीन डॉक्टरों के बोर्ड ने जांच करके रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में कहा गया कि पिता रोजमर्रा के कामों के लिए केयरटेकर पर निर्भर हैं, कानूनी या आर्थिक फैसले लेने की हालत में नहीं हैं और उनके पूरी तरह ठीक होने की संभावना कम है।

इस रिपोर्ट को ध्यान में रखकर कोर्ट ने याचिका मंजूर कर ली। बड़ी बेटी को कानूनी अभिभावक की मान्यता देते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि सरकारी विभाग और संबंधित संस्थाएं उनके इस दर्जे को मानें और उन्हें पिता के हितों की नुमाइंदगी करते हुए उनकी तरफ से कामकाज देखने की इजाजत दें।

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