बीमार मां से मिलने के लिए फरलो: विशाल लांजेवार को नया आवेदन देने की इजाजत
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने उम्रकैद काट रहे कैदी को फरलो के लिए दोबारा अर्जी देने की छूट दी और अपीलीय प्राधिकारी को चार सप्ताह में फैसला करने को कहा।
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नागपुर सेंट्रल जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी विशाल लांजेवार को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ से राहत मिली है। लांजेवार ने अपनी बीमार मां से मिलने के लिए फरलो मांगी थी। हाईकोर्ट ने उन्हें फरलो के लिए नए सिरे से आवेदन करने की इजाजत दी है और संबंधित अपीलीय प्राधिकारी से कहा है कि वह इस पर चार सप्ताह के भीतर फैसला ले।
न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फालके और न्यायमूर्ति राज वाकोड़े की खंडपीठ ने लांजेवार की याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया। इस मामले में अदालत ने फरलो के नियमों पर गौर किया। साथ ही यह सवाल भी देखा कि जो कैदी फरलो के बाद देर से जेल लौटता है, उस पर दोबारा फरलो पाने के लिए जो प्रतीक्षा अवधि लागू होती है, उसका क्या किया जाए।
खंडपीठ ने फरलो का मकसद भी समझाया। उसके मुताबिक फरलो सिर्फ इतनी सी बात नहीं कि कैदी कुछ वक्त के लिए जेल से बाहर जा सके। इससे उसे परिवार से जुड़े रहने, घर की उलझनें सुलझाने और लगातार कैद में रहने के मानसिक असर से राहत पाने का मौका भी मिलता है।
मामले के मुताबिक लांजेवार ने 14 जनवरी 2026 को बीमार मां से मिलने के लिए फरलो की अर्जी दी थी। उनकी ओर से कहा गया था कि परिवार से मिलना जरूरी है, इसलिए उन्हें कुछ समय के लिए जेल से बाहर जाने दिया जाए।
पुलिस रिपोर्ट के आधार पर इस अर्जी का विरोध हुआ। रिपोर्ट में कहा गया कि लांजेवार पहले भी फरलो पर बाहर गए थे, लेकिन तय वक्त पर नहीं लौटे और जेल पहुंचने में उन्हें 35 दिन की देरी हो गई। इस घटना को लेकर उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 265 के तहत अपराध भी दर्ज हुआ था। इसी आधार पर उनकी अर्जी खारिज कर दी गई। फिर वे अपीलीय प्राधिकारी के पास गए, पर वहां भी राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई में नागपुर खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर खंडपीठ के एक फैसले का हवाला लिया, जो दिलीप प्रेमनारायण तिवारी बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में आया था। उस फैसले में माना गया था कि फरलो कैदी को परिवार के संपर्क में रहने, घर की समस्याएं सुलझाने और भविष्य को लेकर उम्मीद बनाए रखने का मौका देती है।
कोल्हापुर खंडपीठ ने यह भी परखा था कि देर से जेल लौटने वाले कैदियों पर प्रतीक्षा अवधि वाला नियम हर मामले में हालात देखे बिना यांत्रिक तरीके से लागू करना ठीक है या नहीं। नियम 7(2) के तहत तय प्रतीक्षा अवधि को लेकर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अधिकारों से जुड़े सवाल उठे थे। ये अनुच्छेद कानून के सामने बराबरी और जीवन व निजी आजादी की हिफाजत से जुड़े हैं।
नागपुर खंडपीठ ने पाया कि लांजेवार ने पहले जो आवेदन दिया था, वह तय एक साल की अवधि पूरी होने से पहले दाखिल हुआ था। हालांकि सुनवाई के वक्त तक वह अवधि बीत चुकी थी। इसलिए कोल्हापुर खंडपीठ के फैसले को ध्यान में रखकर अदालत ने उन्हें नए सिरे से आवेदन की इजाजत दी और याचिका का निपटारा कर दिया।
अदालत के आदेश का मतलब यह नहीं कि लांजेवार को फरलो पर रिहा करने की मंजूरी मिल गई है। अब नए आवेदन पर फैसला संबंधित प्राधिकारी को चार सप्ताह के भीतर लेना है।