सोम‌वार, 2 नवंबर 2026

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नई दिल्ली में सुधीर मुनगंटीवार बोले, भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया को कल्याण की राह दिखाती है

नई दिल्ली में सुधीर मुनगंटीवार बोले, भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया को कल्याण की राह दिखाती है तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
PT24 टीम

गायत्री परिवार के जन्मशताब्दी समारोह में विधायक सुधीर मुनगंटीवार ने भारतीय संस्कृति को सहेजने और दुनिया तक पहुंचाने का संकल्प लेने की अपील की।

नई दिल्ली में हुए एक समारोह में विधायक सुधीर मुनगंटीवार ने कहा कि भारत की महानता सिर्फ उसके भौगोलिक फैलाव, ताकत या इतिहास की शान में नहीं है। यह महानता हजारों साल की तपस्या से बनी अध्यात्म, संस्कार, मानवता और विश्वकल्याण की ऊंची सोच में बसती है। उनके मुताबिक इसी अनमोल संस्कृति को घर घर और मन मन में उतारने और उसकी रोशनी पूरी दुनिया तक पहुंचाने का काम गायत्री परिवार कर रहा है।

यह समारोह वंदनीय माता भगवती देवी शर्मा के जन्मशताब्दी वर्ष पर रखा गया था। मुनगंटीवार ने कहा कि यह सिर्फ एक महान शख्सियत को याद करने का जलसा नहीं है। यह भारत की सनातन सांस्कृतिक चेतना को फिर से जगाने और आने वाली पीढ़ियों तक आध्यात्मिक मूल्यों की विरासत पहुंचाने का संकल्प है। इस पवित्र समारोह में शामिल होने का मौका मिलने पर उन्होंने आभार जताया।

कार्यक्रम में केंद्रीय युवा कार्य और खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया, गायत्री परिवार के डॉ. चिन्मय पंड्या, विश्व हिंदू परिषद के महासचिव स्वामी विज्ञानानंद और रामकृष्ण मिशन के प्रमुख स्वामी सर्वलोकानंद मौजूद थे। उत्तर प्रदेश के विधायक राजेश्वर सिंह के साथ अलग अलग क्षेत्रों के मान्यवर, संत महात्मा और बड़ी तादाद में भाई बहन भी आए थे।

माता भगवती देवी शर्मा के जन्मशताब्दी वर्ष और अखंड ज्योति के अवतरण के 100 साल पूरे होने के मौके पर बोलते हुए मुनगंटीवार ने कहा कि संतों के विचारों से भरी और छत्रपति शिवाजी महाराज के पराक्रम से पावन हुई महाराष्ट्र की धरती से दिल्ली की इस पवित्र भूमि पर आकर गायत्री परिवार के बीच बैठना उनके लिए बड़े सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि हजारों ऊर्जा बनाने वाले बिजलीघर से भी ज्यादा सकारात्मक ऊर्जा उन्हें इस परिवार के साथ रहकर मिली। न्योता देने के लिए उन्होंने डॉ. चिन्मय पंड्या का खास शुक्रिया अदा किया।

माता भगवती देवी शर्मा और वेदमूर्ति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के काम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि गंगा ऋषिकेश और हरिद्वार की जमीन से बहती है, यह सब जानते हैं। लेकिन इन महान हस्तियों ने समाज को जो वैचारिक और आध्यात्मिक गंगा दी, वह हर इंसान के दिल में बह रही है। उनका काम सिर्फ व्यक्तित्व गढ़ने तक सीमित नहीं था, उसने समाज की सोच को नई दिशा दी।

मुनगंटीवार ने कहा कि गायत्री परिवार ने देवपूजा और मंदिर की उपासना से आगे बढ़कर इंसानियत की पूजा करना सिखाया है। सिर्फ मंदिर जाकर पूजा करना धर्म नहीं है। जरूरतमंद की मदद के लिए दौड़ना, मानवता की सेवा करना और हर किसी की जिंदगी में अच्छा बदलाव लाना ही सच्ची और सबसे ऊंची पूजा है। उन्होंने कहा कि गायत्री मंत्र चंद शब्दों का समूह भर नहीं है। वह इंसान के भीतर ऊर्जा जगाता है, जिंदगी को बेहतर दिशा देता है और आत्मिक उन्नति का रास्ता दिखाता है। उनके मुताबिक दुनिया की कई संस्कृतियों के बीच भारतीय संस्कृति ने अपने ऊंचे मूल्यों के दम पर अलग और कभी न मिटने वाली जगह बनाई है। यह संस्कृति सिर्फ भारत की पहचान नहीं, पूरी दुनिया को कल्याण की राह दिखाने वाली विचारधारा है।

देश के प्रति अपनी भावना रखते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे सुंदर देश कौन सा है, यह पूछा जाए तो जवाब भारत ही है। हजारों जन्मों के पुण्य से इस पवित्र भूमि में जन्म मिलता है। दोबारा जन्म का मौका मिले तो वह भारत की धरती पर ही हो, यह भावना हर किसी के मन में होनी चाहिए। भारत को सिर्फ भौतिक रूप से नहीं, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी और समृद्ध बनाने में हर किसी को अपना योगदान देना चाहिए।

डॉ. चिन्मय पंड्या की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि मेडिकल की पढ़ाई के बाद उनके पास अच्छा अस्पताल खड़ा करके चिकित्सा के क्षेत्र में बड़ा योगदान देने का मौका था। लेकिन उन्होंने खुद को समाज की मानसिक और आध्यात्मिक सेहत के लिए समर्पित कर दिया। शरीर की सेहत जितनी ही मन की सेहत भी जरूरी है, इसी समझ से वे जो काम कर रहे हैं, वह समाज के लिए रास्ता दिखाने वाला है। मुनगंटीवार ने उनके सेवाभाव वाले और आध्यात्मिक काम को नमन किया।

अपील करते हुए उन्होंने कहा कि जन्मशताब्दी वर्ष में सब मिलकर भारतीय संस्कृति को सहेजने, बढ़ाने और दुनिया भर में फैलाने का संकल्प लें। भाषण के आखिर में उन्होंने गर्व से भारतीय होने का अभिमान और देश की महानता को लेकर अपनी भावना जताई। उन्होंने कहा कि जब तक सूरज और चांद हैं, भारत की महानता और भारतीय संस्कृति का तेज बना रहेगा, मगर इसके लिए हर भारतीय को अपने आचरण से इस महान परंपरा को सहेजने की जिम्मेदारी उठानी होगी।

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