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20:36 IST

मुंबई की मैनेजर की नौकरी छोड़ रत्नागिरी लौटीं माधुरी कळंबटे, पौधों से खड़ा किया 'वृक्षवल्ली'

अच्छी पढ़ाई, बड़ी कंपनी और स्थिर करियर छोड़कर रत्नागिरी की माधुरी कळंबटे ने अपनी पसंद का कारोबार खड़ा किया।

मुंबई की मैनेजर की नौकरी छोड़ रत्नागिरी लौटीं माधुरी कळंबटे, पौधों से खड़ा किया 'वृक्षवल्ली' तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

अच्छी पढ़ाई, नामी कंपनी की नौकरी और पक्का करियर हो, फिर भी मन को तसल्ली न मिले, तो अपनी पसंद का रास्ता चुनने की हिम्मत बहुत कम लोग दिखा पाते हैं। रत्नागिरी की माधुरी कळंबटे ने यह हिम्मत दिखाई। मुंबई में कॉर्पोरेट सेक्टर की नौकरी छोड़कर उन्होंने प्रकृति के बीच अपना कारोबार शुरू करने का फैसला किया। आज उनका 'वृक्षवल्ली' उद्यम पर्यावरण प्रेम और उद्यमिता का मेल माना जा रहा है। शारदीय नवरात्र उत्सव के मौके पर एक खास पॉडकास्ट में उन्होंने बचपन से लेकर कारोबार खड़ा करने तक का अपना सफर बताया।

माधुरी मूल रूप से रत्नागिरी जिले के चिपळूण इलाके की हैं। उनका बचपन अलोरे बांध के आसपास बीता। कोकण की हरियाली, लाल मिट्टी, भरपूर पानी और खेती के माहौल में वे पली-बढ़ीं। उनके पिता सिंचाई विभाग में काम करते थे और परिवार के बाकी लोग भी खेती से जुड़े थे। करीब 30 सदस्यों के संयुक्त परिवार में रहते हुए खेती के काम, तरह-तरह की फसलें और पेड़-पौधों की देखभाल देखकर उनके मन में पहले से यह इच्छा बनने लगी थी कि आगे चलकर वे प्रकृति से जुड़ा कुछ करें।

बारहवीं के बाद माधुरी डॉक्टर बनना चाहती थीं और उनकी दादी की भी यही इच्छा थी। लेकिन घर की आर्थिक हालत और पढ़ाई के खर्च को देखते हुए उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। मां चाहती थीं कि वे इंजीनियरिंग करें, जबकि माधुरी खुद खेती से जुड़े क्षेत्र में काम करना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने कृषि इंजीनियरिंग चुनी। दापोली के कृषि विश्वविद्यालय जाने पर उन्हें खेती की आधुनिक मशीनों और अलग-अलग कोर्स की जानकारी मिली। ट्रैक्टर चलाने, कृषि मशीनें संभालने और खेती की तकनीक सीखने का मौका मिलना था, इसलिए उन्होंने दाखिला ले लिया। उन्होंने बताया कि उस दौर में इस कोर्स में लड़कियां कम थीं।

पढ़ाई के दौरान उन्हें कई तरह के पेड़ों से पहचान हुई। दापोली के खूबसूरत परिसर में घूमते हुए अलग-अलग पौधों, उनकी खुशबू और खासियतों को लेकर उनकी जिज्ञासा बढ़ती गई। खास तौर पर सुरंगी के पेड़ की खुशबू और सुंदरता ने उन्हें प्रभावित किया। माधुरी के मुताबिक कृषि क्षेत्र में सिर्फ खेती नहीं, बल्कि बागवानी, वनीकरण, कृषि इंजीनियरिंग और फूड प्रोसेसिंग जैसे कई मौके हैं।

मुंबई में पढ़ाई और नौकरी के छह साल आसान नहीं थे। लोकल ट्रेन का सफर, पूरब-पश्चिम की दिशाओं की समझ और शहर की तेज रफ्तार जिंदगी, ये सब उनके लिए नया था। फिर भी उन्होंने हर अनुभव से सीखने की कोशिश की। पैकेजिंग उद्योग की छोटी-बड़ी उत्पादन इकाइयों में जाकर उन्होंने अलग-अलग प्रक्रियाएं समझीं और देखा कि प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बे और दूसरा पैकेजिंग सामान कैसे बनता है। नौकरी उन्होंने ट्रेनी के तौर पर शुरू की और तरक्की करते हुए मैनेजर के पद तक पहुंचीं।

मुंबई की नौकरी से आर्थिक स्थिरता मिल चुकी थी, पर माधुरी को अपने गांव और परिवार की याद लगातार सताती थी। पढ़ाई के लिए बचपन से घर से बाहर रहने के कारण वे अब गांव में बसना चाहती थीं। उनके पति प्रतीक ने इस फैसले में साथ दिया। सास-ससुर ने भी शिक्षा के कर्ज और नौकरी के हालात को समझते हुए सहयोग किया। शादी के बाद भी करीब डेढ़ साल उन्होंने नौकरी जारी रखी और हफ्ते के आखिर में रत्नागिरी जाती रहीं। आखिरकार 2015 के अंत में उन्होंने मुंबई की नौकरी छोड़ दी और रत्नागिरी लौटने का फैसला कर लिया।

लौटने से पहले ही माधुरी स्थानीय प्रदर्शनियों में पौधों के स्टॉल लगाने लगी थीं। उस समय प्रदर्शनियों में कपड़ों, खाने-पीने की चीजों और दूसरे सामान के स्टॉल होते थे, लेकिन पौधों का अलग स्टॉल कम ही दिखता था। माधुरी ने इस मौके का फायदा उठाया। उन्होंने ग्राहकों से बात करके जाना कि उन्हें कैसे पौधे पसंद हैं, घर में कितनी जगह होती है और पौधों की देखभाल में क्या दिक्कतें आती हैं। इसी से उन्हें रत्नागिरी शहर में अच्छी क्वालिटी के पौधे और सही सलाह उपलब्ध कराने की जरूरत समझ आई।

माधुरी के मुताबिक कोई भी कारोबार एक दिन में कामयाब नहीं होता। ग्राहकों का भरोसा जीतने, उनकी जरूरतें समझने और अच्छा सामान देने के लिए लगातार मेहनत करनी पड़ती है। उन्होंने सिर्फ पौधे बेचने के बजाय उन्हें जिंदा रखने की सही जानकारी देने पर जोर दिया। पौधे कैसे लगाएं, कितना पानी दें और देखभाल कैसे करें, इस पर ईमानदारी से सलाह देना उनके काम का अहम हिस्सा बन गया। शुरुआत में कारोबार जमाने में काफी वक्त लगा और उसके बाद कोरोना के दौर की मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा। स्थिर नौकरी के बजाय अपनी पसंद को तरजीह देकर कारोबार खड़ा करने का उनका सफर महिलाओं और नए उद्यमियों के लिए प्रेरणा देने वाला है।

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