सेरेब्रल पाल्सी के साथ जीते निलेश सिंगित, दिव्यांग अधिकारों के लिए कर रहे काम
मुंबई के कार्यकर्ता निलेश सिंगित सुगमता और समान अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं। उन्हें यूनिवर्सल डिज़ाइन अवॉर्ड्स 2026 में सम्मान मिला है।
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दिव्यांग लोगों को सार्वजनिक जगहों, ट्रांसपोर्ट और ज़रूरी सेवाओं का आसानी से इस्तेमाल करने का मौका मिले, इसके लिए देश में कई स्तरों पर कोशिशें चल रही हैं। लेकिन हकीकत में आज भी उन्हें कई रुकावटों का सामना करना पड़ता है।
इसी माहौल में मुंबई के कार्यकर्ता निलेश सिंगित ने दिव्यांगों के अधिकारों और बराबरी के मौकों के लिए लगातार लड़ाई लड़कर अपनी अलग पहचान बनाई है। सुगमता, समावेशन और अधिकारों के रास्ते से दिव्यांग लोगों की ज़िंदगी को ज़्यादा आत्मनिर्भर बनाने का उनका सफर लोगों को प्रेरित कर रहा है।
निलेश सिंगित सेरेब्रल पाल्सी के साथ जीवन जी रहे हैं। उन्होंने दिव्यांगों के सवालों को सिर्फ हमदर्दी की नज़र से देखने के बजाय यह पक्की बात रखी कि उन्हें बराबर के अधिकार मिलने चाहिए। उनका मुख्य आग्रह रहा है कि सार्वजनिक जगहें और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था दिव्यांगों के लिए सुलभ हों।
मुंबई की उपनगरीय रेलवे सेवाओं में सुगमता बेहतर करने और लो-फ्लोर बस शुरू करने की कोशिशों को उन्होंने आगे बढ़ाया। सार्वजनिक संस्थाओं में सुगमता से जुड़े गाइडलाइन तैयार करने में भी उनका योगदान रहा है।
फिलहाल निलेश सिंगित हैदराबाद की नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में विशिष्ट रिसर्च फेलो के तौर पर काम कर रहे हैं। रिसर्च, नीति से जुड़ी वकालत और समुदाय की भागीदारी के ज़रिए वे दिव्यांगों के मुद्दों पर काम करते हैं। उन्होंने दिव्यांग अधिकारों पर आधारित सुगमता ऑडिट, जागरूकता कार्यक्रम, कॉन्फ्रेंस और ट्रेनिंग सेशन आयोजित किए हैं।
इसके अलावा यूनाइटेड किंगडम की डिसेबिलिटी इक्वॉलिटी इन एजुकेशन के सहयोग से हुए एम्पावरमेंट कोर्स में वे भारतीय ट्रेनर और कोऑर्डिनेटर की भूमिका भी निभा चुके हैं।
उनके काम की राष्ट्रीय स्तर पर भी दखल ली गई है। 2022 से 2025 के दौरान वे सुप्रीम कोर्ट की सुगमता समिति के सदस्य रहे। भारत निर्वाचन आयोग ने उन्हें महाराष्ट्र के लिए स्टेट डिसेबिलिटी आइकॉन नियुक्त किया था।
इस साल उन्हें 17वें NCPEDP-Mphasis Universal Design Awards 2026 के तहत 'रोल मॉडल पर्सन विद डिसेबिलिटीज' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस पुरस्कार को उनके लंबे काम और दिव्यांगों के लिए ज़्यादा समावेशी समाज बनाने की कोशिशों की पहचान माना जा रहा है।