मुंबई की हवा फेफड़ों पर भारी, 2025 में शहर में दर्ज हुए 54,390 टीबी मरीज
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विश्व फेफड़ा स्वास्थ्य दिवस पर मुंबई की प्रदूषित हवा, निर्माण की धूल और टीबी के आंकड़ों की ओर ध्यान दिलाया गया है।
मुंबई की हवा में गाड़ियों का धुआं, निर्माण कामों से उड़ने वाली धूल और बारीक प्रदूषक कण घुले हुए हैं। ये सब मिलकर फेफड़ों की सेहत के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर रहे हैं। ऐसे माहौल में दमा, सीओपीडी, फेफड़ों की दूसरी लंबी बीमारियों और सांस से जुड़े और रोगों की तकलीफ बढ़ सकती है। बुधवार, 28 अक्टूबर को विश्व फेफड़ा स्वास्थ्य दिवस के मौके पर इसी चुनौती की तरफ ध्यान दिलाया जा रहा है।
शिवड़ी के सीनियर फेफड़ा रोग और समूह क्षयरोग अस्पताल के पूर्व चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राजेंद्र ननावरे के मुताबिक, गाड़ियों का उत्सर्जन, निर्माण की धूल, औद्योगिक प्रदूषण, धूम्रपान और घर के अंदर का धुआं फेफड़ों की सेहत पर असर डालने वाले अहम कारण हैं। उनके अनुसार, लंबे वक्त तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से खांसी, घरघराहट और सांस फूलने की तकलीफ बढ़ सकती है। डॉ. ननावरे ने कहा कि खास तौर पर दमा और सीओपीडी के मरीजों को ज्यादा ध्यान रखना जरूरी है।
टीबी की चुनौती भी मुंबई में बनी हुई है। डॉ. ननावरे की दी हुई जानकारी के मुताबिक, 2025 में शहर में 54,390 टीबी मरीज दर्ज हुए। इनमें से 48,835 मरीज मुंबई के ही रहने वाले थे। दर्ज मरीजों में करीब 40 फीसदी फेफड़ों के बाहर की टीबी के थे, छह फीसदी बच्चों की टीबी के और आठ फीसदी दवा-प्रतिरोधक टीबी के थे। डॉ. ननावरे का कहना है कि भीड़ वाले घर, कम हवा-आवाजाही और कुपोषण की वजह से बचाव के उपायों की अहमियत और बढ़ जाती है।
राज्य के राष्ट्रीय क्षयरोग उन्मूलन कार्यक्रम की जानकारी के मुताबिक, 7 दिसंबर 2024 से 24 मार्च 2025 तक सौ दिन का अभियान चला। इसमें महाराष्ट्र में 61 लाख लोगों की जांच की गई। जांच से 42,175 टीबी मरीजों का पता चला और उन्हें निक्षय पोर्टल पर दर्ज किया गया। इस दौरान 44,506 निक्षय शिविर लगाए गए।
डॉ. ननावरे के अनुसार, टीबी से ठीक होने के बाद भी कुछ मरीजों के फेफड़ों को हुआ नुकसान बना रह सकता है। इसलिए जरूरत के हिसाब से सांस की क्षमता की जांच और पुनर्वास अहम हो जाता है। वे सलाह देते हैं कि दो हफ्ते से ज्यादा खांसी, खून मिला बलगम, वजन घटना या लगातार सांस फूलना जैसे लक्षण दिखें तो मेडिकल जांच करानी चाहिए।
डॉ. ननावरे ने यह भी कहा कि धूम्रपान से बचना और प्रदूषण के संपर्क को कम करना जरूरी है, फिर भी निर्माण की धूल पर काबू पाना और साफ हवा मुहैया कराना सार्वजनिक सेहत की जिम्मेदारी भी है। इस तरह फेफड़ों की सेहत का सवाल सिर्फ निजी आदतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि साफ हवा के सार्वजनिक मुद्दे से जुड़ गया है।
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