नंदुरबार में स्वीकृत पार्षद पर रघुवंशी के बोल से भाजपा भड़की, शिंदे गुट से फिर तनातनी
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नंदुरबार में स्वीकृत पार्षद के चयन पर शिवसेना विधायक चंद्रकांत रघुवंशी की टिप्पणी से भाजपा नाराज है। जिला परिषद चुनाव से पहले महायुती के तीनों दल अकेले लड़ने की तैयारी में हैं।
महायुती में शामिल भाजपा और शिंदे गुट के बीच अंदरूनी खींचतान की चर्चा पिछले कुछ महीनों से चल रही है। अब नंदुरबार में एक नया विवाद खड़ा हो गया है, जिसकी वजह शिवसेना के विधायक चंद्रकांत रघुवंशी का एक बयान है।
मामला स्वीकृत पार्षद की नियुक्ति का है। नंदुरबार में एक स्वीकृत पार्षद के इस्तीफा देने के बाद उनकी जगह नई नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही थी। भाजपा ने इसके लिए जिस उम्मीदवार का नाम दिया था, उसका आवेदन कागजात की कमियों की वजह से प्रांत अधिकारी ने रद्द कर दिया। इसी बात पर रघुवंशी ने भाजपा को निशाने पर लिया।
रघुवंशी ने तंज कसते हुए कहा कि नंदुरबार शहर में पूरे 1 लाख 10 हजार मतदाता हैं, फिर भी भाजपा को स्वीकृत पार्षद के पद के लिए एक भी लायक और पात्र आदमी नहीं मिला, इस बात की उन्हें शर्म आती है। उनका यह भी कहना था कि सही उम्मीदवार ढूंढने के लिए भाजपा को दूसरों से सलाह लेनी चाहिए थी। उनकी इस टिप्पणी से भाजपा काफी भड़की हुई है और महायुती में फिर विवाद उभर आया है।
यह विवाद ऐसे वक्त में सामने आया है, जब पिछले ही हफ्ते विधान परिषद की पांच में से सिर्फ दो सीटों पर महायुती के उम्मीदवार जीत पाए। बाकी तीन सीटें महाविकास आघाडी के उम्मीदवारों ने जीतीं। इस हार का ठीकरा भाजपा ने शिंदे गुट पर फोड़ा था। वह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि दोनों दलों के बीच यह नई चिंगारी पड़ गई।
नंदुरबार जिले में आने वाले जिला परिषद चुनाव को देखते हुए महायुती के तीनों बड़े दल, यानी भाजपा, शिवसेना (शिंदे गुट) और राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजित पवार गुट), अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी दिखा चुके हैं। चुनाव से पहले ही घटक दलों के एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोंकने से खानदेश के राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चा है और सियासी टकराव अभी से तेज हो गया है।
महायुती बनाकर साथ लड़ने के बजाय तीनों दलों के स्थानीय नेता अपने-अपने संगठन को मजबूत करने के लिए अकेले ताकत आजमाने के मूड में हैं। इससे जिले में दोस्ताना मुकाबले की जगह तिकोने या चौकोने संघर्ष की संभावना बढ़ गई है।
भाजपा के स्थानीय नेताओं ने पक्का भरोसा जताया है कि पिछले दिनों पार्टी के जरिये और सरकार के सहयोग से जो विकास काम हुए हैं, उनके दम पर वे अकेले बहुमत हासिल कर लेंगे। दूसरी तरफ शिवसेना और राष्ट्रवादी ने भी अपने पारंपरिक चुनाव क्षेत्रों पर पकड़ मजबूत करने के लिए अलग रणनीति बनानी शुरू कर दी है।
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