गुरूवार, 29 अक्टूबर 2026

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खून की एक बूंद से होगी एनीमिया और सिकल सेल की जांच, आईआईटी मुंबई की नई तकनीक

खून की एक बूंद से होगी एनीमिया और सिकल सेल की जांच, आईआईटी मुंबई की नई तकनीक तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सेहत PT24 टीम

आईआईटी मुंबई के रिसर्चर्स ने एक सस्ती तकनीक बनाई है, जिससे खून की सिर्फ एक बूंद से एनीमिया और सिकल सेल, इन दो बीमारियों की पहचान हो सकेगी। इसके लिए पूरी सुविधाओं वाली पैथॉलॉजी लैब की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसी वजह से दूरदराज के इलाकों और आदिवासी समुदायों के मरीजों के लिए जांच का एक नया रास्ता खुलने की उम्मीद है।

तरीका यह है कि कांच की एक पट्टी पर खून की बूंद को नियंत्रित ढंग से फैलाया जाता है। इससे जो लेप बनता है, उसकी लंबाई नापी जाती है। खून में लाल कोशिकाओं की मात्रा, प्लाज्मा की गाढ़ापन और कोशिकाओं की लचक के हिसाब से यह लंबाई बदलती है। रिसर्चर्स ने इसी फर्क को जांच के काम में लिया है। यह अध्ययन आईआईटी मुंबई के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रा. महेश तिरुमकुडुलू की अगुवाई में हुआ। टीम ने खून के गाढ़ेपन पर काम किया।

सिकल सेल की जांच के लिए खून में ऑक्सीजन घटाने के बाद होने वाले बदलाव को नापा गया। इसमें सोडियम मेटाबायसल्फाइट नाम का सस्ता केमिकल इस्तेमाल हुआ। महाराष्ट्र और मध्य भारत के आदिवासी इलाकों के 394 लोगों पर टेस्ट किए गए। इनमें स्वस्थ लोगों, सिकल सेल के वाहकों और बीमारी से पीड़ित मरीजों के बीच का फर्क साफ दिखा। इस तरीके से करीब 95 प्रतिशत पीड़ित मरीजों की सही पहचान हो पाई।

एनीमिया के मामले में 516 लोगों के खून के सैंपल की पड़ताल की गई। हीमोग्लोबिन की मात्रा और खून की श्यानता के बीच रिश्ता मिला। इस पद्धति से गंभीर एनीमिया वाले 95.1 प्रतिशत लोगों की सही पहचान हुई, जबकि जिन्हें यह बीमारी नहीं थी, उनमें से 86 प्रतिशत की सही पहचान हो सकी। हीमोग्लोबिन की मात्रा करीब +/-0.8 ग्राम प्रति डेसीलिटर की सटीकता से पता चल गई।

यह तकनीक सिकल सेल के इलाज में काम आने वाली दवा हाइड्रॉक्सियूरिया का असर जांचने में भी मददगार हो सकती है। रिसर्चर्स ने पाया कि जिन मरीजों का इलाज चल रहा था, उनके खून की श्यानता में उम्मीद के मुताबिक बदलाव आया। इससे पता चल सकता है कि मरीज पर इलाज का कैसा असर हो रहा है।

इस रिसर्च की पहली लेखिका डॉ. महरूख मीर हैं। रिसर्च पेपर 'लैब ऑन अ चिप' नाम की पत्रिका में छपा है। तकनीक के कारोबारी इस्तेमाल के लिए 'रिओहीम प्रायव्हेट लिमिटेड' नाम के स्टार्टअप को लाइसेंस दिया गया है। असल इस्तेमाल और जरूरी सरकारी मंजूरियों के लिए रिसर्चर्स संबंधित संस्थाओं के साथ काम कर रहे हैं।

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