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महाराष्ट्र में 13,928 किसानों ने दी जान, 295 पात्र परिवारों को अब भी नहीं मिली सहायता

जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच राज्य में 13,928 किसानों ने आत्महत्या की, RTI के आंकड़ों में 295 पात्र परिवार अब भी मदद के इंतजार में।

महाराष्ट्र में 13,928 किसानों ने दी जान, 295 पात्र परिवारों को अब भी नहीं मिली सहायता तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

महाराष्ट्र में किसान आत्महत्याओं का सिलसिला थमा नहीं है। कर्ज और खेती के संकट से जूझ रहे किसानों की मौतों के आंकड़े सामने आए हैं, तो सरकारी मदद और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं। मिली जानकारी के मुताबिक जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच राज्य में 13,928 किसानों ने आत्महत्या की। यानी औसतन हर दिन 8 से ज्यादा किसान अपनी जान गंवा रहे हैं।

ये आंकड़े RTI के तहत मिली जानकारी से निकले हैं। इनके मुताबिक 13,928 मामलों में से 8,145 परिवार सरकारी मदद के लिए पात्र पाए गए। 4,042 मामले अपात्र घोषित कर दिए गए, जबकि 941 मामलों की जांच अभी चल रही है।

पात्र परिवारों में भी सबको मदद नहीं मिली है। 8,145 पात्र परिवारों में से 7,850 परिवारों को 1 लाख रुपये की सहायता दी गई। बाकी 295 परिवार अब भी इंतजार में हैं। मतलब पात्र घोषित होने के बाद भी इन परिवारों तक मदद नहीं पहुंची।

जितेंद्र घाडगे ने बताया कि उन्होंने जिलेवार और महीनेवार डेटा मांगा था। 24 जुलाई को जन सूचना अधिकारी ने जवाब दिया कि यह जानकारी संबंधित जिलाधिकारी कार्यालयों से ले ली जाए। इसके बाद घाडगे ने 18 अगस्त को पहली अपील दाखिल की। 8 सितंबर को हुई सुनवाई के बाद विभाग ने राज्य के कुल आंकड़े तो दे दिए, लेकिन ब्योरा देने से मना कर दिया।

घाडगे के मुताबिक पिछले 10 सालों में यह पहली बार है कि विभाग ने जिलेवार आंकड़े देने से इनकार किया है। उनका आरोप है कि ऐसा अधिकारियों के दबाव में किया गया।

घाडगे ने सुझाव दिया है कि जिन परिवारों के मुआवजे के दावे खारिज हो गए हैं, उन्हें भी गोपीनाथ मुंडे किसान दुर्घटना बीमा योजना के तहत 2 लाख रुपये का कवर दिया जाए। उन्होंने संकट से घिरे परिवारों की पहचान करने और उन्हें सरकारी योजनाओं का फायदा दिलाने के लिए तालुका स्तर पर समितियां बनाने की भी मांग की है।

उनके कहने के मुताबिक मुख्यमंत्री कार्यालय ने ईमेल मिलने की पुष्टि की और उसे कृषि विभाग को भेज दिया, लेकिन अब तक उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है। जिलेवार जानकारी न होने से यह समझना मुश्किल है कि संकट की सबसे ज्यादा मार किन इलाकों पर पड़ी है और सरकारी मदद कितनी पहुंच रही है।

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