सिर्फ बीपी नहीं, फ्लू और शिंगल्स जैसे इन्फेक्शन से भी बढ़ सकता है ब्रेन अटैक का खतरा
वर्ल्ड स्ट्रोक डे 2026 पर बताया गया कि हाई बीपी, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल के अलावा फ्लू और शिंगल्स जैसे वायरस के इन्फेक्शन से भी स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। 50 साल के बाद क्या सावधानी रखें, यह भी समझाया गया।
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वर्ल्ड स्ट्रोक डे 2026 के मौके पर डॉक्टर याद दिला रहे हैं कि स्ट्रोक किसी की भी जिंदगी पूरी तरह बदल सकता है। इसका असर सिर्फ मरीज पर नहीं पड़ता, उसके परिवार और देखभाल करने वालों पर भी पड़ता है। आम बोलचाल में स्ट्रोक को ब्रेन अटैक भी कहते हैं। दिमाग के किसी हिस्से तक खून पहुंचना बंद हो जाए, या दिमाग की कोई नस फट जाए, तो स्ट्रोक आ सकता है।
स्ट्रोक किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, खतरा भी बढ़ता जाता है। वजह यह है कि उम्र के साथ नसें पहले जैसी लचीली नहीं रहतीं। इसीलिए बुजुर्गों में स्ट्रोक का जोखिम ज्यादा रहता है। भारत में विकलांगता के मुख्य कारणों में स्ट्रोक पांचवें नंबर पर आता है। स्ट्रोक के बढ़ते मामलों और मरीज के परिवार व सेहत के पूरे सिस्टम पर पड़ने वाले असर को देखते हुए यह समझना जरूरी है कि खतरा किन वजहों से बढ़ता है, ताकि इससे बचा जा सके।
स्ट्रोक से बचाव की बात होती है तो ज्यादातर जोर हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान और शारीरिक मेहनत की कमी पर दिया जाता है। ये सारी वजहें अहम हैं ही। लेकिन इनके अलावा कुछ और खतरे भी हैं, जिनके बारे में लोगों को कम जानकारी होती है और जिन्हें समझना उतना ही जरूरी है।
ऐसा हर बार नहीं होता कि स्ट्रोक का खतरा सिर्फ दिल या नसों की दिक्कतों से बढ़े। हाल की कुछ रिसर्च में सामने आया है कि कुछ इन्फेक्शन का भी स्ट्रोक के बढ़े हुए खतरे से रिश्ता हो सकता है। इनमें फ्लू और शिंगल्स जैसे वायरस से होने वाले इन्फेक्शन शामिल हैं। फिर भी इन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। एक संभावित वजह यह है कि वायरस के इन्फेक्शन से शरीर में सूजन आ सकती है और खून जमने की प्रक्रिया में भी बदलाव हो सकते हैं। इससे स्ट्रोक और नसों से जुड़ी दूसरी जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है।
शिंगल्स एक बीमारी है, जो वैरिसेला-जोस्टर वायरस (VZV) के दोबारा सक्रिय होने से होती है। यही वायरस चिकनपॉक्स यानी छोटी माता की वजह भी बनता है। चिकनपॉक्स ठीक होने के बाद यह वायरस शरीर में निष्क्रिय हालत में पड़ा रह सकता है। आगे चलकर, खासकर जब रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाए, तब यह फिर सक्रिय होकर शिंगल्स कर सकता है।
ज्यादातर लोग शिंगल्स को बस त्वचा पर निकलने वाले दर्दनाक दाने समझते हैं। मगर इस बीमारी का असर सिर्फ त्वचा तक सीमित नहीं रहता। VZV दिमाग की छोटी और बड़ी, दोनों तरह की नसों पर असर डाल सकता है, जिससे नसों में सूजन आ सकती है। इस हालत को स्ट्रोक का खतरा बढ़ने और दिमाग की नसों से जुड़ी दूसरी जटिलताओं से जोड़ा गया है।
उम्र बढ़ने के साथ लंबे वक्त तक अच्छी सेहत बनाए रखने के लिए यह जानना जरूरी हो जाता है कि कौन सी चीजें सेहत पर असर डालती हैं। 50 साल पार करने के बाद खासकर उन लोगों को ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जिन्हें पहले से कोई पुरानी बीमारी है। स्ट्रोक का खतरा बढ़ाने वाली आम वजहों को काबू में रखने के साथ-साथ, इन्फेक्शन होने और उससे जटिलताएं खड़ी होने की संभावना घटाने के लिए भी कुछ आसान उपाय किए जा सकते हैं।
मिसाल के तौर पर, जब फ्लू और सांस से जुड़े दूसरे इन्फेक्शन बढ़ रहे हों, तब भीड़ वाली जगहों पर मास्क लगाना फायदेमंद हो सकता है। लक्षण दिखें तो वक्त पर जांच कराकर डॉक्टर की सलाह लेना भी काम आ सकता है। इसके अलावा सेहतमंद जीवनशैली, खान-पान में जरूरी बदलाव और उम्र व सेहत के हिसाब से सुझाए गए टीकाकरण के बारे में डॉक्टर से बात करना भी सेहत की हिफाजत के बड़े नजरिए का एक अहम हिस्सा हो सकता है।
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